Skip to main content

Please note that this site in no longer active. You can browse through the contents.

नवम्बर के मुख्य खेती-बाड़ी कार्य

 

 फसलोत्पादन

धान

  • धान की शेष पकी फसल की कटार्इ कर लें।

गेहूँ

  • धान की कटार्इ के बाद गेहूँ के लिए खेत की तैयारी तत्काल कर लें। देख लें कि मि Íी भुरभुरी हो जाये और ढेले न रहने पायें।
  • गेहूँ में बोआर्इ का सबसे अच्छा समय 15 से 30 नवम्बर तक का है। इस बीच गेहूँ की बोआर्इ हर हालत में पूरी कर लें।
  • प्रमाणित और शोधित बीज ही बोयें।
  • यदि बीज शोधित न हो तो प्रति किलोग्राम बीज को 2 ग्राम कैप्टान अथवा 25 ग्राम थीरम से शोधित कर लें।
  • यू.पी.डब्ल्यू.-343, एच.डी.-2888, डी.बी.डब्ल्यू-39, यू.पी.-2382, एच.यू.डब्ल्यू-510 गेहूँ की उपयुक्त किस्में हैं।
  • बोआर्इ 20-23 सेमी की दूरी पर कतारों में हल के पीछे कूडों में या सीड डि्रल से करें। इसमें प्रति हेक्टेयर 100 किग्रा बीज लगेगा।
  • प्रति हेक्टेयर 60 किग्रा नाइट्रोजन, 60 किग्रा फास्फेट व 40 किग्रा पोटाश बोआर्इ के समय प्रयोग करें। यदि खरीफ में खेत परती रहा हो या दलहनी फसल ली गयी हो तो 60 किग्रा की जगह कुल 50 किग्रा नाइट्रोजन डालना होगा। हा ँ, अगर हरी खाद का प्रयोग किया गया है तो केवल 40 किग्रा नाइट्रोजन पर्याप्त होगा।
  • अगर मिटटी में जस्ते की कमी हो तो प्रति हेक्टेयर 25 किग्रा जिंक सल्फेट बोआर्इ के पहले ही अनितम जुतार्इ के समय खेत में मिला दें।
  • खाद और बीज एक साथ डालने के लिए फर्टी-सीड डि्रल का प्रयोग करना अच्छा होगा।
  • अगर गेहूँ के साथ रार्इ की सहफसली करनी हो, तो गेहूँ की प्रत्येक 9 कतार के बाद एक कतार रार्इ बो सकते है। याद रहे रार्इ की बोआर्इ छिटकवाँ तरीके से न करें।
  • बोआर्इ के 20-25 दिन बाद 6-8 सेमी या 3- 4 अंगुल की सिंचार्इ करना जरूरी है।
  • अगर खेत समतल है तो सिंचार्इ से पहले, वरना सिंचार्इ के 3-4 दिन बाद 40-60 किग्रा नाइट्रोजन की टाप ड्रेसिंग कर दें।

जौं

  • पूर्वी उत्तर प्रदेश में सिंचित क्षेत्र होने की दशा में जौं की बोआर्इ 15 नवम्बर तक और पशिचमी उत्तर प्रदेश तथा बुन्देलखण्ड के इलाके में 15 से 30 नवम्बर के मध्य पूरी कर लें।
  • बोआर्इ 20 सेमी की दूरी पर 5-6 सेमी की गहरार्इ में कूडों में करें।
  • यदि बीज प्रमाणित न हो तो बोआर्इ से पूर्व कैप्टान या थीरम से उपचारित करें।
  • बोआर्इ के लिए प्रति हेक्टेयर 75 किग्रा बीज की जरूरत होगी।
  • बोआर्इ के समय प्रति हेक्टेयर 30 किग्रा नाइट्रोजन, 30 किग्रा फास्फेट तथा आवश्यकता होने पर 20 किग्रा पोटाश प्रयोग करें।

लाही

  • बोआर्इ के 15-20 दिन पर अथवा हर हालत में सिंचार्इ के पहले पौधों की छँटार्इ कर लें। पौधे घने होने और खरपतवार बढ़ने से लाही की उपज में 20-30 प्रतिशत की कमी हो सकती है। घने पौधों को निकालकर पौध से पौध की दूरी 10-15 सेमी कर लें।
  • बोआर्इ के 30 दिन बाद सिंचार्इ करें। इसके बाद ओट आने पर प्रति हेक्टेयर 50 किग्रा नाइट्रोजन की टाप ड्रेसिंग करें।
  • पतितयों को खाने वाली आरा मक्खी और बालदार गिडार का नियंत्रण करें।

रार्इ

  • बोआर्इ के 15-20 दिन के बाद घने पौधे की छँटनी करके पौधे की आपसी दूरी 15 सेमी कर लें।
  • बोआर्इ के 5 सप्ताह के बाद पहली सिंचार्इ और फिर ओट आने पर प्रति हेक्टेयर 75 किग्रा नाइट्रोजन का छिड़काव करें।
  • कीटों की रोकथाम लाही की तरह ही करें।

चना

  • बोआर्इ के 30-35 दिन के बाद निरार्इ-गुड़ार्इ कर लें।

मटर

  • मटर की बोआर्इ के 20 दिन के बाद निरार्इ कर लें। बोआर्इ के 40-45 दिन बाद पहली सिंचार्इ करें। फिर 6-7 दिन बाद ओट आने पर हल्की गुड़ार्इ भी कर दें।

मसूर

  • बोआर्इ के लिए 15 नवम्बर तक का समय अच्छा है।
  • शेखर-2, शेखर-3, पंत मसूर-4 , पतं मसूर-5  या नरेन्द्र मसूर-1 प्रजातियाँ उपयु क्त हैं।
  • एक हेक्टेयर खेत में 40 किग्रा बीज की आवश्यकता होगी। ध्यान रहे कि बीज प्रमणित अथवा सत्य और शोधित हों।
  • प्रति हेक्टेयर 20 किग्रा नाइट्रोजन, 50-60 किग्रा फास्फेट और पोटाश की आवश्यकता होगी।
  • अगर जिंक की कमी हो तो प्रति हेक्टेयर 25 किग्रा की दर से जिंक सल्फेट खेत की अनितम तैयारी के पहले जमीन में अच्छी तरह मिला दें।
  • बोआर्इ 20-25 सेमी की दूरी पर कतारों में करें।

शीतकालीन मक्का

  • सिंचार्इ की सुनिशिचत व्यवस्था होने पर रबी मक्का की बोआर्इ माह के मध्य तक पूरी कर लें।
  • मृदा परीक्षण न होने पर बोआर्इ के समय सामान्यत : प्रति हेक्टेयर 40 किग्रा नाइट्रोजन, 60 किग्रा फास्फेट व 40 किग्रा पोटाश और यदि भूमि में जिंक की कमी हो तो बोआर्इ के पहले 25 किग्रा जिंक सल्फेट भूमि में अवश्य मिलाना चाहिए।
  • पहली निरार्इ-गुड़ार्इ, बोआर्इ के 20-25 दिन बाद करें जिससे खेत में खरपतवार न रहे।
  • बोआर्इ के लगभग 25-30 दिन बाद पहली सिंचार्इ कर दें।
  • पौधे के लगभग घुटने तक की ऊँचार्इ के होने या बोआर्इ के लगभग 30-35 दिन बाद प्रति हेक्टेयर 87 किग्रा यूरिया की टाप ड्रेसिंग कर दें।

शरदकालीन गन्ना

  • बोआर्इ के 3-4 सप्ताह बाद निरार्इ-गुड़ार्इ कर लें।

बरसीम

  • बोआर्इ के बाद 2-3 सिंचार्इ एक-एक हफ्ते पर और फिर आवश्यकतानुसार हर 20-25 दिन पर करते रहें।
  • बोआर्इ के 45 दिनों के बाद पहली कटार्इ करें।
  • फसल कटार्इ के बाद फिर सें सिंचार्इ करनी होगी।

जर्इ

  • नवम्बर का पूरा महीना चारे हेतु जर्इ बोने के लिए अच्छा है।
  • जर्इ की केन्ट, यू.पी.ओ.-94, यू.पी.ओ.-212, क्लेमिंग गोल्ड किस्में अच्छी हैं।
  • एक हेक्टेयर में 80-100 किग्रा बीज की जरूरत होगी।

 

सब्जियों  की खेती

 

  • आलू की कुफरी बहार, कुफरी बादशाह, कुफरी अशोका, कुफरी सतलज, कुफरी आनन्द तथा लाल छिलके वाली कुफरी सिन्दू री और कुफरी लालिमा मुख्य प्रजातियाँ हैं।
  • प्रसंस्करण हेतु आलू की कुफरी चिप्सोना-1 एवं चिपसोना-2 उपयुक्त प्रजातियाँ हैं।
  • आलू की बोआर्इ यदि अक्टूबर में न हो पायी हो तो अब जल्दी पूरी कर लें।
  • अक्टूबर में बोये आलू की सिंचार्इ करें। बोआर्इ के 25-30 दिन बाद 87-108 किग्रा यूरिया की टाप ड्रेसिंग करके मिÍी चढ़ा देनी चाहिए।
  • सब्जी मटर की बोआर्इ 15 नवम्बर तक कर सकते है ं। मटर की अर्किल, आजाद पी-1, आजाद पी-3 मुख्य प्रजातियाँ हैं।
  • सब्जी मटर के लिए प्रति हेक्टेयर 80-100 किग्रा बीज लगेगा। बोआर्इ 30 सेमी की दूरी पर कतारों में करें।
  • बोआर्इ के समय सब्जी मटर में प्रति हेक्टेयर 60 किग्रा नाइट्रोजन, 60 किग्रा फास्फेट व 30-40 किग्रा0  पोटाश प्रयोग करें।
  • नवम्बर में फ्रेन्चबीन, पालक, मेथी, धनिया, मूली की बोआर्इ की जा सकती है। अक्टूबर में बोयी गयी इन सबिजयों की आवश्यकतानुसार निरार्इ व सिंचार्इ करें।
  • टमाटर की बसन्तग्रीष्म ऋतु की फसल के लिए पौधशाला में बीज की बोआर्इ कर दें।
  • टमाटर की पूसा रूबी, पंजाब छुहारा, पन्त बहार उन्नत एवं पूसा हाइबि ्रड-2, अविनाश-2 , नवीन, रूपाली व रशि म संकर किस्में अच्छी है ं।
  • एक हेक्टेयर खेत की रोपार्इ के लिए उन्नत किस्मों की 350-400 ग्राम और संकर किस्मों की 200-250 ग्राम बीज की आवश्यकता पड ़ती है।
  • लहसुन की बोआर्इ यदि न हुर्इ हो तो इस माह पूरी कर लें।
  • लहसुन के लिए यमुना सफेद (जी-282) प्रजाति उपयुक्त है।
  • लहसुन के खेत की तैयारी के समय प्रति हेक्टेयर 25-30 टन गोबर की खाद या 7-8 टन नादेप कम्पोस्ट मिला दें और 35-40 किग्रा नाइट्रोजन, 50 किग्रा फास्फेट व 50 किग्रा पोटाश बोआर्इ से पहले अनितम जुतार्इ के समय प्रयोग करना चाहिए।
  • पिछले माह बोये गये लहसुन की निरार्इ- गुड़ार्इ तथा सिंचार्इ करें एवं बोआर्इ के 40 दिन बाद 74 किग्रा यूरिया की प्रथम टाप ड्रेसिंग कर दें।
  • प्याज की रबी फसल के लिए पौधशाला में बीज की बोआर्इ करें।
  • रबी हेतु एग्रीफाउन्ड लाइट रेड, पूसा रेड प्रजातियाँ अच्छी हैं।
  • पौधशाला में बोने के लिए प्रति हेक्टेयर 8-10 किग्रा बीज पर्याप्त होता है।

 

फलों की खेती

 

  • आम एवं अन्य फलों के बाग में जुतार्इ करके खरपतवार नष्ट कर दें।
  • आम के मिलीबग कीट के नियंत्रण हेतु तने और थाले के आसपास फालीडाल धूल का बुरकाव तथा तने के चारों और एल्काथीन की पÍ ी लगायें।
  • नये लगें छोटे पेड़ों की कतारों के बीच में चनामटरमसूर की बोआर्इ करें।
  • आम के पेड़ों में थालों की सफार्इ कर दें तथा सूखी एवं रोगग्रस्त टहनियों को काट दें।
  • अमरूद में छाल खाने वाले कीड़ों की रोकथाम डाइक्लोरोवास एक मिली प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर छेदों में भरकर चि कनी मिटटी से लेप कर दें।
  • आंवले, नींबू, पपीता में सिंचार्इ करें।
  • आंवले की तुड़ार्इ एवं विपणन की व्यवस्था करें।
  • आंवले में दीमक से बचाव हेतु फोरेट 10 जी प्रति पौधा 25-30 ग्राम डालकर मिटटी  में मिला दें।
  • आंवला में शूट गाल मेकर कीट से ग्रस्त टहनी को काटकर जला दें एवं पेड ़ों पर डाइमेथोएट 2 मिली एवं मैंकोजेब 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
  • केले में प्रति पौधा  55 ग्राम यूरिया का प्रयोग करें तथा 10 दिन के अन्तराल पर सिंचार्इ करें।
  • केले मे पर्ण धब्बा एवं सड़न रोग के लिए 1 ग्राम कार्बन्डाजिम प्रति लीटर की दर से  छिड़काव करें।

 

पुष्प व सगन्ध पौधे

 

  • देशी गुलाब की कलम काटकर अगले वर्ष के स्टाक हेतु क्यारियों में लगा दें।
  • ग्लेडियोलस में स्थानीय मौसम के अनुसार सप्ताह में एक या दो बार सिंचार्इ करें।
  • रजनीगंधा के स्पाइक की कटार्इ-छँटार्इ, पैकिंग, विपणन तथा पोषक तत्वों के मिश्रण का अनितम चरणीय छिडकाव करें।
  • जनवरी में रोपार्इ हेतु मेंथा को क्यारियों में दुबारा लगा दें।

 

पशुपालनदुग्ध विकास

 

  • संतति को खीस (कोलेस्ट्रम) अवश्य मिलायों।
  • पशुओं को स्वच्छ जल ही पिलायें।
  • खुरपका-मुँहपका रोग का निरोधक टीका लगवायें।
  • कृमिनाशक दवा का सेवन करायें।
  • पशुओं को संतुलित आहार देते रहें।
  • थनैला रोग (दूध में छिछड़ें आना) का उपचार करायें।
  • नमक मिश्रण खिलाते रहें।
  • दुहने से पहलेे थन को साफ पानी से धोयें तथा बर्तन व वातावरण भी स्वच्छ रखें।

 

मुर्गीपालन

 

  • लेयर फीड और सीप का चूरा दें।
  • 14-16 घण्टे प्रकाश उपलब्ध करायें।
  • कृमिनाशक दवा पिलवायें।
  • बिछावने को नियमित रूप से पलटते रहें।

 

0
Your rating: None