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वृंत : गन्ना

  वृंत

  • गन्ने के वृंत में संधि (जोड़) नामक खंड होते हैं।
  • प्रत्येक संधि गाँठ एवं पोरी का बना होता है।
  • गाँठ वह होता है जहाँ वृंत के साथ पत्ती संलग्न होती है और जहाँ कलिकाए एवं मूल आद्यक पाए जाते हैं।
  • आधार पर संधियां छोटी होती हैं और पोरियाँ धीरे-धीरे बढ़ती जाती हैं।
  • गाँठ की जड़ पट्टी में स्थित कलिकाएं छोटी पत्तियों से युक्त लघु वृंत से युक्त भ्रूणीय प्ररोह होती हैं।
  • बाहरी छोटी पत्तियाँ शल्को के रूप में होती हैं। वाह्यतम कलिका शल्क छत्र रूप रखता है।
  • सामान्यत: प्रत्येक गाँठ पर एक कलिका उपस्थित होती है और वृंत के एक पार्ष्व के साथ दूसरे पार्ष्व के बीच बारी-बारी से होते हैं।
  • जड़ पट्टी में भी मूल अद्यकों के ढीले ढंग से निर्धारित पंक्तियाँ होती हैं। प्रत्येक आद्यक में एक काला केन्द्र दिखाई देता है जो जड़ टोपी और एक हलके रंग का ''प्रभामंडल'' (हैलो) होता है।
  • गन्ने की बोआई करने पर प्रत्येक कलिका एक प्राथमिक प्ररोह उत्पन्न कर सकती है जो ''दोजियाँ'' नामक द्वितीयक प्ररोह रखते है जो प्राथमिक प्ररोह पर भूमिगत कलिकाओं से उत्पन्न हो सकती है।


                            stalk of sugarcane


वृंत के सभी रंग दो मूल वर्णको - ऐन्थोसाइएनिन के लाल रंग और पर्णहरित के हरा रंग- से उत्पन्न होते हैं। पीला वृंत इन वर्णको की आपेक्षिक कमी को सूचित करता है। वर्धक वलय को छोड़कर पोरी का पृष्ठ लगभग मोम से ढका रहता है।

  • जहाँ पोरीतत्त्वों द्वारा क्रिया हेतु खुली रहती है, सामान्यत: मोमी पृष्ठ पर काली फफूँदी विकसित हो जाती है।
  • ऊपरी 1/3 भाग में अनेक कलिकाएं होती हैं और पोशकों की अच्छी पूर्ति होती रहती है, जो रोपाई के लिए बीज गन्ना के रूप् में इसे उपयोगी बनाता है जबकि शेष 2/3 भाग में अच्छा सुक्रोस अंश होता है।
  • पोरी का अनुप्रस्थ काट केन्द्र से बाहर की ओर निम्नलिखित ऊतक प्रदर्शित करता है: बाह्यत्वचा, वल्कुट या छिलका और अंत:स्थापित संवहनी बंडलों से युक्त भरण ऊतक। वाह्य त्वचा ऐसी कोशिकाओं की एक पृष्ठीय परत होती है जो भिन्न प्रतिरूप प्रदर्शित करती है जो प्रजाति पर निर्भर होते हैं। सामान्यतया, ये प्रतिरूप दो प्रकार की कोशिकाओं- ऐसी तथाकथित लंबी कोशिकाओं और छोटी कोशिकाओं से बनते हैं जो एक दूसरे से बारी-बारी बदलती रहती है।
  • वल्कुट या छिलका में बाह्यत्वचा के ठीक भीतर कोशिकाओं की कई परतें हाती हैं।
  • छिलका की कोशिकाएं मोटी दीवार युक्त एवं काष्ठिभूत हाती हैं।
  • भरण ऊतक (ग्राउन्ड टिशु) में जाइलम (दारू) एवं फ्लोएम (पोषवाह) से युक्त संवहनी बंडल होते हैं।
  • दारू ऊतक जड़ों से ऊपर की ओर जल एवं इसमें घुले हुए खनिजों को पहुँचाता है और पोषवाह (फ्लोएम) वाहक ऊतक पादप निर्मित पोशकों एवं उत्पादों को अधिकांश हिस्से के लिए जड़ों की ओर नीचे भेजता है।
  • संवहनी बंडल अधिक छोटे और वृंत की परिधि की ओर अधिक चालू बने रहते हैं।
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