Skip to main content

लीची : पौधे का संपूर्ण विवरण


लीची: पौधे का वर्णन

          यह एक ओजपूर्ण सदापर्णी बहु वर्षी वृक्ष है जो विस्तृत शिखर फैलने वाली शाखाओं और संयुक्त पत्तियों से युक्त सघन हरे रंग के चमकने वाले पर्णसमूह के साथ, 5 मीटर से अधिक ऊँचाई प्राप्त करता है। पुष्प, पुष्पगुच्छों के रूप में लगते हैं।

वृक्ष की आकारिकी :

          लीची वृध्दि में सर्वथा एक समान रहने वाला सदापर्णी सुन्दर वृक्ष है। यह घना गोल शीर्ष रखता है। तरूण अवस्था पर पेड़ कोमल होते हैं जबकि जड़ें पूर्ण रूप से अनुपयुक्त दशाओं के लिए असहिष्णु होती हैं। जैसे ही वृक्ष पूर्ण विकसित हो जाता है तो दीर्घजीवी बने रहने की प्रवृत्ति रखता है और हष्टपुष्ट हो जाता है। वृक्ष की सामान्य ऊँचाई 6-10 मीटर के परिसर में होती है। वृक्ष की शाखाएं भूमि से लगभग एक मीटर तक होती हैं।

पत्ती :

          पत्तियां एकान्तर पिच्छाकार होती हैं और 3 से 7 पर्णको से युक्त होती है। ये 8-12 से.मी. लम्बी, 4-6 से.मी. चौड़ी, चीमड़, आयतरूप दीर्घवृत्ताकार से लेकर भालाकार, अरोमिल और ऊपर से चमकदार गहरे हरे रंग की होती हैं। पत्तियाँ अपने तरूण वृध्दि के बहारों में सुन्दर रक्ताभ कांस्य रंग रखने की प्रवृत्ति रखती हैं। 

वर्धी एवं जनन प्ररोह :

          अंतस्थ टहनी पर फल पत्तोदार उद्वर्ध उत्पन्न करना प्रारम्भ करता है। वर्धी प्ररोह के सिरे पर जनन कलिका प्रकट होती है। वानस्पतिक एवं जनन वृध्दियाँ कुछ समय तक पास-पास आगे बढ़ती है। कुछ दिनों के बाद नई वर्धी पत्तियों का बाहर निकलना रूक जाता है जबकि पुष्पक्रम बढ़ना जारी रहता है। मिश्रित पुष्पक्रम भी देखे गए हैं।

पुष्पक्रम :


         यह नए प्ररोह की पहली या दूसरी सर्वोच्च पत्ती के कक्ष से उत्पन्न होने वाला अन्तस्थ या कक्षस्थ कलिका होती है। इस पर बहुत छोटा हरा- सफेद या पीला फूल लगता है और यह शाखित होता है। पुष्पक्रम लम्बाई में 10-35 से.मी. और विस्तार में 5-30 से.मी. होता है। 

पुष्प :

          लीची में तीन प्रकार के पुष्प पाए जाते हैं :

1-   नर या पुंकेसरी पुष्प - इन पुष्पों में स्त्रीकेसर का अभाव होता है। परवर्ती संरचना (स्त्रीकेसर) द्वारा घेरी गई दशा में गुलाबी रोमिल प्रोद्वर्ध होता है जो वर्तिकाग्र एवं वर्तिका दोनों से रहित स्त्रीकेसर का अधिक अल्पविकसित या अवर्धित रूप होता है। तंतु लम्बाई में भिन्न होता है।

2-   मादा या मादा के रूप में कार्य करने वाला उभयलिंगी पुष्प - पुष्प सुविकसित अंडाशय एवं वर्तिकाग्र रखने वाला कार्यात्मक दृष्टि से उभयलिंगी होता है। अंडाशय में इसकी वर्तिकाग्री पालियों से युक्त 2-4 अंडप होते हैं। पुष्प में छोटे तंतुओं से युक्त पुंकेसर पाए जाते हैं।

3-   नर के रूप में कार्य करने वाला उभयलिंगी पुष्प- पुंकेसर एवं स्त्रीकेसर उपस्थित होते हैं परन्तु पराग का प्रवेश होने देने के लिए वर्तिकाग्र की पालियां खुली नहीं होती हैं। तंतु लम्बाई में भिन्न होते हैं। पुंकेसर लम्बाई के दो सेटों में होते हैं। परन्तु केवल लम्बे तंतुओं से युक्त पुंकेसर निषेच्य (अबंध्य) होते हैं। स्त्रीकेसर में छोटी अविभाजित वर्तिका, शुष्क वर्तिकाग्री शाखाएं होती हैं और यह अकार्यात्मक होता है।

फल :


          परिपक्व लीची के फल वानस्पतिक दृष्टी से 'नट' होता है। फल 2 से लेकर 20 तक के गुच्छे में लगते हैं। पके फल अधिक स्वादिश्ट होते हैं। लीची का छिलका पतला, भंगुर, आवरण सदृष होता है जो कल्टीवार के आधार पर मैहरून,लाल, हरा या गहरे भूरे रंग का होता है। बीज चोल रसदार, बर्फ के समान सफेद, पारभासक, चूर्णमय, मीठा और बीच से आसानी से अलग करने योग्य होता है। बीज चमकदार चाकलेट या गहरे भूरे रंग का होता है। फलभित्ति में बाह्य फलभित्ति,मध्य फलभित्ति और अंत:फलभित्ति होता है। 

बीज :

          बीज गूदेदार बीजचोल में अंत:स्थापित होता है। यह बेलनाकार, संपीडित (दबा हुआ), पियानो-उत्ताल या अवतलोत्ताल, ऐल्बुमिनहीन और चाकलेटी रंग का होता है। निर्बीज कल्टीवारों में बीज छोटा, झुर्रीदार और जीवन-अक्षम होता है।




 

0
Your rating: None

Please note that this is the opinion of the author and is Not Certified by ICAR or any of its authorised agents.