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रासायनिक विधियाँ

रासायनिक विधि
अपतृणनाशी कम समय में,कम लागत से शीघ्र परिणाम देते हैं।खरपतवारों के सफल नियंत्रण एवं आर्थिक लाभ हेतु इनको समझना और इनकी सीमाएं जानना अति आवश्यक है।धान के अंकुरण से पूर्व अपतृणनाशी के प्रयोग से धान की आरम्भिक बढ़वार औज पूर्ण होती है, क्योंकि धान को प्रतिस्पर्धा रहित वातावरण मिलता है।इनका उपयोग कर कम समय में अधिक क्षेत्रफल के खरपतवारों का नियंत्रण करना संभव होता है।अतः मजदूर उपलब्ध न होने पर भी निराई के झंझट से छुटकारा मिल जाता है । मजदूरों की कमी एवं बढ़ती मजदूरी की दरों के कारण रासायनिक विधि से खरपतवार नियंत्रण, अब परिहार्य हो चला है । इनके उपयोग से कृषकों के लाभांश में भी पर्याप्त वृद्धि हुई है ।
रासायनिक विधि की अपनी सीमाएं है जो निम्न हैः

● रसायन आयात करने होते हैं, अतः विदेशी मुद्रा की आवश्यकता होती है ।
● आवश्यकता की पूर्ति हेतु उपलब्ध रसायनों की मात्रा प्रायः पर्याप्त नहीं होती है ।
● प्रयोग हेतु छिड़काव या भुरकाव यंत्रों जैसे नैपसेक स्प्रेयर (Knapsack sprayer) आदि की आवश्यकता होती है ।
●  आरम्भिक व्यय, साधारण किसान के वित्तीय साधनों से बाहर हो जाते हैं ।
● रसायन-प्रयोग हेतु प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है ।
●  लापरवाही से किया गया अपतृणनाशी का प्रयोग अपर्याप्त खरपतवार नियंत्रण और फसल को हानि पहुंचा सकता है । इसी प्रकार स्वास्थ्य एवं वातावरण पर भी कुप्रभाव देखा गया है ।

वे सब रसायन शाकनाशी कहलाते हैं, जिनके संपर्क में आने पर पौधों की जीवन-क्रियाएं अव्यवस्थित हो जाती है तथा वे प्रायः समाप्त हो जाते हैं । परन्तु अपतृणनाशी उन रसायनों के लिए प्रयोग में आता है, जो फसल में खरपतवारों के नियंत्रण हेतु प्रयोग किए जाते हैं । ये दो प्रकार के होते हैं (१) संस्पर्शी एवं (२) व्यवस्थित । संस्पर्शी (Contact)
इस प्रकार के अपतृणनाशी पौधे की कोषिकाओं से सीधे संपर्क में आते हैं तथा उन्हें नष्ट कर देते हैं । प्रायः पत्तियों एवं तनो पर इनका पूर्ण रूपेण छिड़काव करना होता है । इनका बहुवर्षीय खरपतवारों पर केवल तब प्रभाव पड़ता है, जब वे पौद (Seedling) की अवस्था में होते हैं । इस श्रेणी में प्रोपेनिल (Propanil) एवं ऑकसीफ्लोरफेन (Oxyflourfen) वरणात्मक (Selective) तथा पाराक्‍वाट  (Paraquat) निविशेष (Non-selective) अपतृणाशी आते हैं ।

व्यवस्थिक (Systemic or Translocated)
ये अपतृणनाशी पौधे के पत्तों, तने अथवा जड़ के संपर्क में लाए जाते हैं, जो शारीरिक अंतः क्रिया से एक स्थान से दूसरे स्थान में पहुंच जाते हैं तथा खरपतवारों को नष्ट करते हैं । ब्यूटाक्लोर तथा २,४-डी इसके उदाहरण हैं । ये भी पौधे की किस्म के अनुसार वरणात्मक एवं निविशेष दोनों प्रकार के होते हैं।

अपतृणनाशी का वरणात्मक होने के कारण ही धान के पौधों के साथ उगे हुए सांवक के पौधों को नष्ट किया जा सकता है, यद्यपि दोनों ही घास कुल के पौधे हैं । बाह्यः रूप में इन दोनों पौधों में विशेष अंतर नहीं दिखता, केवल अनुभवी हाथ ही इन्हें पहचान सकते हैं । वरणात्मक अपतृणनाशी भी निश्चित की गई मात्रा से अधिक प्रयोग करने पर निविशेष की तरह ही व्यवहार करते हैं । अतः धान अवशोषित अपतृनाशी की मात्रा ही तृणनाशी के वरणात्मक गुण के लिए उत्तरदायी है।

शाकनाशी का पौधों में संचलन (Movement)
खरपतवारों पर शाकनाशियों का प्रतिकूल प्रभाव हो अर्थात उनकी अंतः एवं बाह्यः क्रियात्मक क्रियाएँ विचलित हो, उसके लिए शाकनाशियों का खरपतवारों के अंतः भागों (Internal System) अथवा बाह्यः अंगो पर पहुंचाना आवश्यक है । ये पत्तियों की सतह एवं कलियों से बिसरण (Diffusion) द्वारा पौधे के अंतः भागों में पहुंचते हैं, अपेक्षाकृत ऊँचा तापमान इसमें सहायक है । स्टोमेटा की गार्ड कोषिका और उपचर्म (Cuticle) द्वारा पौधों में शाकनाशियों का अवशोषण होता है ।

भूमि में डाले गये शाकनाशी बीज और जड़ों के पास उपस्थित मृदा-जल के मध्यम से पौधों में पहुंचते हैं अथवा मूल-शिखा द्वारा अर्न्तरोधित (Intercepted ) कर लिए जाते हैं । शाकनाशियों का कभी -कभी जड़ों की एपिडरमल (Epidermal) कोषिकाओं से समूह प्रवाह  (Mass flow) द्वारा अवशोषित किया जाता है ।

फ्लोयम (Phloem) द्वारा हरी पत्तियों से शर्करा भंडार-कोषिकाओं को जाता है, अतः इस क्रिया में बाधा पड़ने से पौधों पर विषैला प्रभाव देखने को मिलता है । दारू-वाहिका (Xylem) द्वारा पौधा पानी एवं अन्य पौषक तत्वों का अवशोषण करता है तथा पत्तियों तक पहुंचता है । शाकनाशी भी पानी एवं अन्य पौषक तत्वों का अवशोषण करता है तथा पत्तियों तक पहुंचता है । शाकनाशी भी इसी व्यवस्था से पौधे में पहुंचता है, जिसकी गति वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले कारक जैसे-तापमान, रोशनी, हवा की गति, आर्द्रता तथा भूमि-जल पर निर्भर करेगी । ट्राइजिन (Triazine) इसका अच्छा उदाहरण है ।

शाकनाशी का मिट्टी में व्यवहार
जलमग्न एवं ढ़लानी उच्च भूमियों की मिट्टियों में भौतिक, रासायनिक तथा जैविक भिन्नताएं होती हैं । इसलिए इन दो प्रकार की मिट्टियों में वायुजीवी (Aerobic) और रिडोक्स दशा (Redox Condition) तथा पी.एच.मान में अंतर पाया जाता है । इसी अंतर के कारण शाकनाशियों की विघटन (Degradation) दर में विभिन्नता आ जाती है ।

जल के साथ शाकनाशी मिट्टी तक पहुंचते हैं जहां क्ले (Clay) तथा जैव पदार्थो (Organic Matter) द्वारा रोक लिए (Adsorbed) जाते हैं अधिक पानी होने से कुछ मात्रा रिस जाती है, फलस्वरूप मिट्टी की निचली सतहों में चले जाते हैं । मिट्टी की सतह पर रोके गये शाकनाशी का सूक्ष्मजीवों (Micro-organism) द्वारा अपघटन होता है । मटियारी मिट्टियां अधिक मात्रा में शाकनाशियों को रोक लेती हैं । अतः रेतीली दोमट मिट्टी की तुलना में मटियारी दोमट मिट्टी में अपेक्षकृत अधिक मात्रा में शाकनाशियों की आवश्यकता होती है ।

शाकनाशी का प्रकाश-रसायन एवं जैव-रसायन अपघटन, नमी की मात्रा से प्रभावित होता है । उदाहरणार्थ कार्बोक्सलिक इस्टर (Carboxylic ester) का जल अपघटन, मृदा- जल के अधिक पी.एच.मान से प्रेरित होता है । कुछ शाकनाशी परा-बैंगनी (अल्ट्रावायलेट) प्रकाश ग्रहण करते हैं । परा-बैगनी प्रकाश ग्रहण करने वाले शाकनाशी का स्वतंत्र मृदा जल में हयूमिक (Humic) अम्ल की उपस्थिति से प्रकाश -रसायन अपघटन होता है ।

 शाकनाशी-स्थिरता (Persistence) वह अवधि है, जिसमें शाकनाशी पौधों पर अपना प्रभाव रखता है । यह अवधि शाकनाशी की उपयोग की गई मात्रा, उसके गुण तथा नीक्षलन (Leaching) पर निर्भर करेगी । अधिक समय तक स्थिरता होने पर फसल को लम्बे समय तक खरपतवार रहित वातावरण मिलने की संभावना होगी । धान की फसल के बाद तक स्थिरता बनी रहने पर आने वाली फसल को इससे हानि हो सकती है । अतः शाकनाशी का चुनाव करते समय उसकी स्थिरता एवं फसल-चक्र का भी ध्यान रखना होगा ।

शाकनाशी प्रयोग का समय
फसल एवं खरपतवार दोनों के परिपेक्ष्य में निम्न शब्द प्रायः प्रयोग किये जाते हैं:

बिजाई से पूर्व (Pre-plant)
इनका प्रयोग बिजाई से पूर्व किया जाता है तथा मिट्टी में मिला देते हैं, जिससे शाकनाशी मिट्टी में खरपतवारों के बीज क्षेत्र में पहुंच जाता है । इस प्रकार इनका वाष्पीकरण (Volatilization) द्वारा अप्रभावी होना रोका जा सके । ये अंकुरित होते बीज पर अपना प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं । पाराक्वेट (1,1'-Dimethyle-4,4'-bipyridylium lon) इसका उदाहरण है ।

पूर्वोदभेद (Pre-emergence)
ये वे शाकनाशी है, जो फसल की बिजाई के बाद तथा खरपतवार एवं/ या फसल के अंकुरण से पूर्व खेत में प्रयोग किये जाते हैं । इनका भूमि सतह पर बिखराव या छिड़काव करते हैं, जिससे वे अंकुरित पौधों पर अपना प्रतिकूल प्रभाव डाल सके । ब्यूटाक्लोर N- (buthoxymethyl-2-Chloro-N-(2,6 diethylacetanilide) acetamide इसी श्रेणी में आता है ।

जमाव के बाद (अंकुरण-पश्च) (Post-emergence)
इन शाकनाशियों को फसल या खरपतवार अथवा दोनों के अकुरण के पश्चात् प्रयोग करते हैं । इसका अच्छा उदाहरण २,४-डी (2,4- Dichloro Phenoxy Acetic Acid) है ।

सामान्यतः रेत अथवा यूरिया में मिलाकर पूर्वोदभेद शाकनाशियों का प्रयोग किया जाता है । पम्प द्वारा छिड़काव के परिणाम वैसे भी अच्छे पाये गये हैं । श्रीनिवासन एवं चौधरी (१९९३) ने ब्यूटाक्लोर का विभिन्न वाहको (Carriers) के साथ रोपित -धान में प्रयोग किया तथा पाया कि उसकी खरपतवार नियंत्रण क्षमता ६१.१ से ६८.४ प्रतिशत के बीच रही । इससे

सारणी - 4:  अपतृणनाशी वाहकों / वितरकों का धान की उपज एवं खरपतवार नियंत्रण पर प्रभाव ।

अनीलोफास +2,4-डी (0.3+051 कि./है.)

दाने की उपज (ट./है.)

खरपतवारों का शुष्क भार
(ग्रा./मी.2)

खरपतवार नियंत्रण
क्षमता (%)

शक्ति की आवश्यकता
(एम.जे./है.)

1.नैपसेक स्प्रे पम्प (625 ली. पानी /है.)

5.4

9.5

61.5

374

2.रेत में मिलाना (५० कि.ग्रा. रेत /है.)

5.4

6.5

73.7

322

3.यूरिया के साथ( 25 कि.ग्रा./है.)

5.4

7.8

68.4

1014

4.छिड़काव -बोतल द्वारा

5.3

9.8

61.1

316

5.हाथ से निराई (रोपाई के २० एवं ४० दिन बाद)

5.2

12.8

48.2

1179

6.अनियंत्रित (बिना खरपतवार निकाले)

3.1

24.7

-

-

क्रांतिक सीमा (0.05)

0.1

1.8

-

-

स्रोतः श्रीनिवासन एवं चौधरी (१९९३)

विभिन्न वितरकों से उपज में सार्थक अंतर नहीं आया, नहीं आया, परन्तु खरपतवारों के शुष्क भार में अंतर पाया गया । इन्होंने सर्वाधिक शक्ति की अवश्यकता हाथ द्वारा निराई में पाई पाई (सारणी - 4) ।

 अपतृणनाशी का थान एवं खरपतवारों पर प्रभाव
सभी अपतृणनाशी खरपतवारों पर एक समान प्रभाव नहीं डालते । अतः सारणी -5में धान के मुख्य खरपतवारों के प्रति सामान्यतः पाए जाने वाले अपतृणनाशियों की संवेदनशीलता दी गई है (नयार्को एवं डे दत्ता,१९९१) । इस जानकारी से खरपतवार नियंत्रण हेतु उपयुक्त अपतृणनाशी का चुनाव करने में सुविधा होगी । रोपाई एवं सीधे बिजाई, इन दोनों विधियों द्वारा उगाई गई धान की फसलों के लिए उपयुक्त अपतृणनाशियों के चुनाव के संबंध में निम्न जानकारी मार्गदर्शक सिद्ध हो सकती हैः

रोपाई द्वारा उगाई फसल
ऐसी स्थिति में ब्यूटाक्लोर १.५ कि.ग्रा./ है. एवं ऑक्सीडाइजोन ०.७५ कि.ग्रा. /है. (पाण्डे एवं शुक्ला, १९९०), पेंडीमेंथेली १.५ कि.ग्रा./है. (वर्मा आदि, १९८७), अनीलोफास ०.६ कि.ग्रा. /है. (धीमान आदि, १९९५ए) एवं प्रीटीलाक्लोर १.० कि.ग्रा./ है. (ओम आदि, १९८९ और धीमान एवं नांदल, १९९५) आदि पूर्वोदभेद प्रयोग करने से संतोषजनक स्तर पर खरपतवार नियंत्रण प्राप्त हुआ तथा धान की उपज में वृद्धि हुई । ब्यूटाक्लोर एवं थायोबेन्कार्ब के दानेदार पदार्थ को जलमग्न परिस्थति में प्रभावकारी पाया गया, जबकि इनके तरल रूप को जल संतृप्त स्थिति में अपेक्षाकृत अच्छा पाया गया । बारी-बारी से गीली और सूखी स्थिति की दशा में दोनों ही प्रकार के उत्पादों से संतोषजनक नियंत्रण पाया गया (सिंह एवं सिंह,१९८८) । अनीलोफास तरल (Emulsion Concentrate, EC) एवं दानेदार उत्पादों को मस्टा नियंत्रण हेतु पूर्वोदभेद रूप में प्रयोग करने पर उत्तम परिणाम प्राप्त हुए । मलिक एवं सिंह (१९९४) ने दानेदार (Granular) उत्पादों को मस्टा नियंत्रण हेतु पूर्वोदभेद रूप में प्रयोग करने पर उत्तम परिणाम प्राप्त किए । साथ ही इन्होंने दानेदार ब्यूटाक्लोर को सर्वोत्तम पाया । अन्य अपतृणनाशियों का प्रभाव सारणी - 6 में दिया गया है, जिनकी खरपतवार-नियंत्रण क्षमता ६० से ८० प्रतिशत तक अनुमानित की गई है ।

नांदल एवं सिंह (१९९४) द्वारा पालमपुर (हि.प्र.) में अनीलोफास ०.४५ कि.ग्रा. /है., आँक्साइडाजोन ०.५ कि.ग्रा. /है. ब्यूटाक्लोर १.० कि.ग्रा. /है. एवं प्रीटीलाक्लोर ०.७५ कि.ग्रा./है. रोपाई के ५ अथवा १० दिन बाद प्रयोग करने पर संतोषजनक खरपतवार नियंत्रण क्षमता एवं उपज में सार्थक वृद्धि प्राप्त हुई (सारणी-7) । उन्होंने इन अपतृणनाशियों का आने वाली गेहूं की फसल पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पाया । गोगोई एवं गोगोई (१९९३) ने भी असम में कार्य करते हुए ब्यूटाक्लोर १.० कि./ है. को अन्यो की तुलना में अधिक प्रभावकारी पाया । इन्होंने खरपतवारों का अधिकतम शुष्क भार ३३.५ ग्रा./मी.2 एवं खरपतवार नियंत्रण क्षमता २७.२ प्रतिशत पाई । धीमान आदि (१९९८ए) ने हरियाणा बासमती -१ के साथ किए अध्ययन में 

सारणी-4 उपलब्ध अपतृणनाशियों के प्रति धान की फसल में मुख्य खरपतवारों की प्रतिक्रिया (फिलीपिंस) ।

खरपतवार

अपतृणनाशी

ब्यूटाक्लोर
Butachlor

पेंडीमेंथेलीन
Pendimenthalin

थायोबेन्कार्ब
Thiobencarb

ऑक्साडाइजोन

Oxadiazon

औक्सीफ्लोरफेन
Oxyflourfem

प्रीटीलाक्लोर

Pretilachlor

प्रोपेनिल
Propanil

2,4-डी

2,4-D

 

1

2

3

4

5

6

7

8

9

अजेरेटम कोनीजोइडस

Ageratum conyzoides

सु.

-

प्र.

सु.

सु.

-

-

सु.

आल्टरनेथ्रा सेशिलिस

Alternanthera sessilis

-

-

-

सु.

-

-

सु.

सु.

अमरेंथस स्पाइनोसस

Amaranthus spinosus

सु.

सु.

प्र.

सु.

सु.

-

सु.

सु.

अमेनिया कोकिन्या

Ammannia coccinea

सु.

-

सी.प्र.

-

-

-

सु.

-

ब्रेचेरिया म्यूटिका

Brachiaria mutica

प्र.

प्र.

-

प्र.

प्र.

-

प्र.

प्र.

कोमेलिना बेंघालेसिस

Commelina benghalensis

प्र.

प्र.

सी.प्र.

सी.प्र.

सु.

-

प्र.

सी.प्र.

साइनोडांन डेक्टाइलान

Cynodon dactylon

प्र.

प्र.

प्र.

प्र.

प्र.

-

प्र.

प्र.

साइपेरस डिर्फोमिस

Cyperus difformis

सु.

सु.

सु.

स.सु.

सु.

सु.

सु.

सु.

साइपेरस ईस्कूलेंटस

Cyperus esculentus

सी.सु.

प्र.

प्र.

-

सु.

-

प्र.

सी.सु.

साइपेरस इरिया

Cyperus iria

सु.

प्र.

सु.

सु.

प्र.

सु.

सु.

सु.

साइपेरस रोटंडस

Cyperus rotundus

प्र.

सु.

प्र.

प्र.

प्र.

-

प्र.

प्र.

डैक्टीलोक्टीनिम इजिप्शियम

Dactyloctenium-aegyptium

-

सु.

प्र.

सु.

सु.

-

सु.

प्र.

डिजिटेरिया सेंगुईनेलिस

Digitaria sanguinalis

सु.

सु.

सु.

सु.

सु.

-

स.प्र.

प्र.

इकाईनोक्लोआ कोलोना

Echinochloa colona

सु.

सु.

सु.

सु.

सु.

सु.

सु.

प्र.

इकाईनोक्लोआ क्रुसगेली

Echinochloa crusgalli

सु.

सु.

सु.

सु.

सु.

सु.

सु.

प्र.

इकाईनोक्लोआ ग्लेबरेसेन्स

Echinochloa glabrescens

सु.

-

सु.

सु.

सु.

सु.

सु.

प्र.

1

2

3

4

5

6

7

8

9

10

एक्लिप्टा एल्बा

Eclipta alba

सी.प्र.

प्र.

सी.प्र.

सी.प्र.

सु.

-

सी.प्र.

सु.

इर्कोनिया क्रेसिपस

Eichhomia crassipes

-

सु.

प्र.

-

-

-

-

सु.

इल्युसिन इंडिका

Eleusine indica

सु.

सु.

सु.

सु.

सु.

-

सी.सु.

प्र.

इलियोचेरिस एसिकलेरिस

Eleocharis acicularis

सु.

सु.

सु.

-

-

सु.

सु.

-

यूर्फोबिया हिरटा

Euphorbia hirta

-

सी.प्र.

प्र.

-

सु.

-

-

सी.सु.

फिम्ब्रीस्टाइलिस मिलेमी

Fimbristylis miliacea

सु.

सु.

सु.

-

सु.

सु.

सु.

सु.

इम्पेरेटा सिंलडरिका

Imperata cylindrica

प्र.

प्र.

प्र.

प्र.

प्र.

-

प्र.

प्र.

आईपोमिया एक्यूटिका

Ipomoea aquatica

प्र.

-

-

-

-

-

-

सु.

इस्चीमम रूगोसम

Ischaemum rugosum

सु.

सु.

सी.सु.

-

सु.

सु.

सु.

प्र.

लेप्टोकलोओ चानेनसिस

Leptochloa chinensis

सु.

सु.

सु.

-

सु.

सु.

सी.प्र.

-

लडविजिका ओक्टोवेलिस

Ludwigia octovalis

सु.

-

-

सु.

सु.

सु.

सु.

सु.

मरसिलिया माइनूटा

Marsilea minuta

सु.

सु.

सी.सु.

-

सु.

प्र.

-

-

मोनोकोरिया वैजीनेलिस

Monochoria vaginalis

सु.

सु.

सी.सु.

सु.

सु.

सु.

सु.

सु.

पास्पेलम डिस्टीकम

Paspalum distichum

प्र.

प्र.

प्र.

प्र.

प्र.

-

प्र.

प्र.

पोरटूलाका ओलिरेसिया

Portulaca oleracea

प्र.

सु.

सु.

सी.सु.

सु.

-

सु.

सी.प्र.

सिटेरिया ग्लौयूका

Setaria glauca

सु.

सु.

-

सु.

-

-

सु.

-

स्फेनाकचलिका जिलेनिका

Sphenocleo zeylanica

सु.

सु.

-

सु.

सु.

सु.

सु.

सु.

ट्राइएंथिमा र्पोटूलेकस्ट्रम

Trianthema portulacastrum

प्र.

सु.

-

-

-

-

प्र.

-

-= जानकारी उपलब्ध नही है; सु.= सुग्राहय (susceptible);  सी.प्र.= सीमित प्रतिरोधी (moderatly resistant), खरपतवार निरूद्व हुए । सी.सु.=सीमित सुग्राही (modrratly Susceptible), आंशिक नियंत्रण ।; प्र.= प्रतिरोधी (resistant), खरपतवार पर कोई प्रभाव नही ।

स्रोतः नयार्को एवं डे दत्ता (१९९१)
 
सारणी -6 रोपाई की दशा में अपतृणनाशियों का धान की उपज पर प्रभाव (करनाल, हरियाण) ।
 

उपज

मात्रा (कि.ग्रा./है.)

+ खरपतवारों का शुष्क भार (ग्रा./मी.2)

दाने की उपज
(ट./है.)

नियंत्रण (%)

ब्यूटाक्लोर (दा.)

1.00

13.5

8.80

86

क्वीनक्लोरेक (व.पा.)

0.20

28.8

8.36

74

थायोबेन्कार्ब (२०%)

1.00

30.0

8.35

72

प्रीटीलाक्लोर (तरल)

0.45

24.1

8.32

75

पेंडीमेंथेलीन (दा.)

0.75

24.4

8.42

76

पाइप्रोफोस (दा.)

0.30

71.1

8.13

60

खरपतवार रहित

-

0

9.03

100

अनियंत्रित

-

193.9

6.56

0

क्रांतिक सीमा (०.०५)
 

-

20.1

0.36

-

दा.= दानेदार, व.पा.= घुलनशील पाउडर,*- कटाई के समय ।
स्रोतः मलिक एवं सिंह (१९९४)
 

सारणी -7:  विभिन्न अपतृणनाशियों का धान की उपज एवं खरपतवार नियंत्रण क्षमता पर प्रभाव (पालमपुर,हि.प्र.)।
 

उपचार

 मात्रा (कि.ग्रा./ है.)

उपयोग का समय

धान की उपज (ट./है.)
(ट./है.)                   

1989                 1990 

खरपतवारों का शुष्क
भार*** (ग्रा./मी.2)                       

1989                          1990

खरपतवार नियंत्रण
क्षमता (%)                      

1989                       1990

अनीलोफास
(Anilophos)

0.60

5*

3.64                  3.41

5.54                           7.44

80                           67

ऑक्साडाइजोन
(Oxadiazon)

0.50

पी.ई.

3.65                  3.39

5.13                            8.06

82                            56

ब्यूटाक्लोर
(Butechor)

1.00

पी.ई.

3.69                   3.68

5.04                            7.79

82                             59

प्रीटीलाक्लोर
(Pretilachlor)

0.75

पी.ई.

4.06                   3.51

4.60                           7.17

86                             71

हाथ से निराई

-

30 एवं60*

3.91                    3.59               

6.96                           7.38

85                              67

खरपतवार रहित

-

60*तक

3.96                   3.81

0.71                            0.71

86                               80

अनियंत्रित

-

-

2.25                    2.10

13.45                         12.03

-                                  -

क्रांतिक सीमा (0.05)

-

-

0.72                    0.26

1.26                           1.07

-                                -

रोपाई के बाद दिन; पी.ई. =अंकुरण पूर्व ;**परिवर्तित मान-Ö X+0.5

स्रोतः नांदल एवं सिंह (१९९४)

ब्यूटाक्लोर (50 E.C.)@1.5 कि.ग्रा., अनीलोफास (30 E.C.)@0.4 कि.ग्रा.एवं प्रीटीलाक्लोर (50 E.C.)@0.75 कि.ग्रा./ हैक्टर को प्रभावकारी पाया, साथ ही 67.8 से 74.4% खरपतवार नियन्त्रण क्षमता आंकी । बहुकेन्द्र परीक्षण के आधार पर आरगोल्ड (Argold) 0.075 कि.ग्रा. /है. और अलीनोफास + ट्राइक्लोपयर (Trichlopyr)1.25 कि.ग्रा है. रोपित धान हेतु तथा एनीलोफास + इथोक्सीसल्फुरान (Ethoxysulfuron) क्रमशः 0.25 +0.01 कि.ग्रा. /है. और ब्यूटाक्लोर+ सेफनर 1.0 कि.ग्रा. /है. सीधे बिजाई की दशा में आशातीत अपतृणाशक पाए गए (डी.आर.आर.,१९९९ ए) ।

अंकुरण-पूर्व अपतृणनाशियों के प्रयोग से धान की आरम्भिक अवस्था में अच्छा नियंत्रण मिलता है और खरपतवारों की बढवार अवरूद्ध हो जाती है, परन्तु बाद की अवस्था में कुछ खरपतवार बढ़ जाते हैं, क्योंकि इन अपतृणनाशियों का शेष प्रभाव अधिक अवधि  तक नहीं रहता है । अतः अंकुरण-पश्च भी किसी अन्य प्रकार से नियंत्रण आवश्यक हो जाता है । इसलिए दो अपतृणनाशियों के मिश्रण के प्रयोग के परिणाम अच्छे पाए गये । अखिल भारतीय समन्वित धान सुधार परियोजना के अंर्तगत देश के विभिन्न स्थानों पर मुख्य अपतृणनाशियों को परखा गया । सारणी -8 में इन स्थानों से प्राप्त दाने की उपज दी गई है, जिससे ज्ञात होता है कि अनीलोफास अथवा ब्यूटाक्लोर के साथ २,४-डी.ई.ई. का मिश्रण खरपतवार नियंत्रण के लिए लगभग खरपतवार -रहित दशा के समान ही लाभकारी होता है । इसी अध्ययन में ओक्सीफ्लोरफेन का धान की फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पाया गया (डी.आर.आर.,१९९५डी) ।     

सारणी - 8 : देश विभिन्न केन्द्रों पर रोपित धान की उपज (ट./है.) पर खरपतवार नियंत्रण विधियों का प्रभाव (खरीफ,1994) ।

उपचार                               सांद्रण (%)                  मात्रा (कि.ग्रा./है.)                             परीक्षण केन्द्र                                                                                         
                                                                                                       अदुतुरई                मारूटेरू     त्रिपुरा    पंत नगर      कौल       कपूर थला

2,4 -डी.ई.ई.

36 ए.ई.

0.4

3.98

4.78

3.95

6.08

3.19

3.15

अनीलोफास

30 ई.सी.

0.4

4.23

4.28

3.50

5.44

4.00

4.6

अनीलोफास+

24 ई.सी.+

0.4+

4.48

5.07

4.28

7.33

3.97

3.10

2,4 -डी. ई.ई.

36 ए.ई.

0.53

 

 

 

 

 

 

ब्यूटाक्लोर+

50 ई.सी.

1.0+

4.68

5.17

4.03

6.74

3.25

2.28

2,4 - डी. ई.ई.

36 ए.ई.

0.4

 

 

 

 

 

 

प्रीटीलाक्लोर

50 ई.सी.

0.75

4.04

4.78

3.93

6.35

3.98

3.13

औक्सीफ्लोरफेन

25 डब्लयू.पी.

0.05

4.65

4.72

3.62

5.92

3.31

2.80

ऑक्साडाइजोन

25 ई.सी.

0.375

4.11

4.84

3.73

6.84

3.83

3.54

खरपतवार रहित

-

-

4.81

5.48

4.32

7.34

4.70

4.10

अनियंत्रित

-

-

3.66

4.46

3.07

4.14

2.59

1.68

क्रांतिक सीमा (0.05)

-

-

0.87

NS

0.55

0.70

0.62

0.83

स्रोतः डी.आर.आर. (1995  डी)

सारणी -9:  धान की खरपतवार-नियंत्रण तकनीक का आर्थिक मूल्यांकन
(वर्ष १९८९ एवं १९९० का औसत) ।

उपचार

 दाने की उपज
(टा./है.)

सकल आय
(रु./है.)

अतिरिक्त उपज का
मूल्य (रु./है.)

नियंत्रण हेतु व्यय
(रु./है.)

आय/ व्यय
अनुपात

अनीलोफास,0.6 कि.ग्रा. /है.

5.58

12093

3551

384

9.2

2,4-डी. 0.8 कि.ग्रा./है.

5.23

11488

2847

143

19.9

खरपतवार रहित़

6.47

14018

5476

1575

3.5

हाथ से 2 बार निराई

5.91

12843

4302

1050

4.1

अनियंत्रित

3.95

8541

-

-

-

स्रोतः धीमान आदि (१९९५ए)
राजू एवं रेड्डी (१९९०) ने ब्यूटाक्लोर (१.० कि.ग्रा. /है.) +2,4- डी. (1.0 कि.ग्रा./है.) के मिश्रण को पूर्वोदभेद के रूप में प्रयोग करने से इनको अलग-अलग प्रयोग करने की तुलना में अधिक प्रभावकारी पाया । अपेक्षाकृत बड़े भूखण्ड़ों पर किए गये अध्ययन के आधार पर धीमान आदि (१९९५ए) ने पाया कि अनीलोफास प्रयोग करने से 2,4- डी की तुलना में धान की उपज ज्यादा होती है, परन्तु आय /व्यय अनुपात ज्ञात करने पर २,४ डी को सर्वाधिक लाभकारी अपतृणनाशी पाया गया । उन्होंने खरपतवार-रहित स्थिति में सर्वाधिक उपज (६.४७टा./है.) प्राप्त की, परन्तु आय/ व्यय अनुपात सबसे कम (३.५) रहा (सारणी -9) । अतः विभिन्न अपतृणनाशियों का आर्थिक दृष्टि से मूल्यांकन करना भी आवश्यक है । परिस्थितियों के अनुसार इन संस्तुतियों में आंशिक परिवर्तन किए जा सकते हैं ।

सीधे बिजाई द्वारा उगाई फसल
अखिल भारतीय समन्वित धान सुधार परियोजना के अंर्तगत सीधे बिजाई स्थिति में अपतृणनाशियों के प्रभावों का कई अनुसंधान केन्द्रों पर अध्ययन किया गया (सारणी -10) । परिणामों से ज्ञात हुआ कि ब्यूटाक्लोर+ सेफनर तथा प्रीटीलाक्लोर +सेफनर के प्रयोग से दो निराई के समकक्ष उपज प्राप्त होती है । यह भी पाया कि अपतृणनाशी का एक बार प्रयोग सीधे बिजाई की दशा में प्रभावकारी खरपतवार नियंत्रण नहीं कर पाता (डी.आर.आर.,१९९५बी) । भान (१९७८) ने उच्च भूमि धान के लिए खरपतवार नियंत्रण हेतु प्रोपेनिल का सुझाव दिया । टूटेजा आदि (१९९५) ने रायपुर में किए अध्ययन में पाया कि ब्यूटाक्लोर १.५ कि.ग्रा./है. अथवा अनीलोफास ०.४ कि.ग्रा. /है. को बिजाई के ४ दिन बाद एवं २,४-डी.ई.ई.०.४ कि.ग्रा. /है. को बिजाई के ३५ दिन बाद उपयोग करने पर २ निराईयों (२५ एवं ५०, दिन बाद) के समान की धान ही उपज प्राप्त होती है । इस प्रकार दो बार विभिन्न अपतृणनाशियों के प्रयोग से ही अधिकांश खरपतवार नियंत्रित हो सके । उन्होंने अध्ययन में घास कुल के खरपतवार अपेक्षाकृत ज्यादा पाये । पंकल के बाद सीधे बिजाई की दशा में, ब्यूटाक्लोर १.० कि.ग्रा./ है. के साथ हाथ से एक निराई (बिजाई के ३० दिन बाद) करने पर ४.५६ ट./ है. धान की उपज प्राप्त

सारणी -10: देश के विभिन्न अनुसंधान केन्द्रों के पंकलित खेतों में सीधे बिजाई करने की दशा में खरपतावार नियंत्रण विधियों का धान की उपज (ट./है.) पर प्रभाव (खरीफ, १९९४) ।

उपचार                          सांद्रण             मात्रा(कि.ग्रा./ है.)                                               परीक्षण केन्द्र                                                                                 
                                       (%)                                                            मांडया           चिपलिमा     पूसा         फैजाबाद            नयागांव  

प्रीटीलाक्लोर+ सेफनर

30 ई.सी.

0.6

5.31

2.81

2.72

2.55

5.70

ब्यूटाक्लोर +सेफनर

50 ई.सी.

1.0

5.86

3.12

2.44

2.37

6.23

ब्यूटाक्लोर

50 ई.सी.

1.5

3.96

2.60

2.85

2.32

5.79

अनीलोफास

30 ई.सी.

0.4

2.72

1.99

2.78

2.47

5.60

बैंथियोकार्ब

50 ई.सी.

1.0

4.33

2.98

2.29

2.31

6.21

खरपतवार रहित

-

-

4.97

3.38

3.26

3.32

6.62

अनियंत्रित

-

-

3.96

2.25

2.08

1.44

4.85

क्रांतिक सीमा (0.05)

-

-

0.50

0.19

0.49

0.45

0.69

स्रोतः डी.आर.आर. (१९९५ बी)
 

की और खरपतवारों के सकल शुष्क भार में सार्थक गिरावट पाई । ये परिणाम २ निराईयों के समान पाए गये (धीमान एवं नांदल, १९९६) ।

कलिता एवं गोगोई (१९९४) ने धान के बीजों को ४० प्रतिशत कैलशियम पर ऑक्साईड (CaCO2) से लेपने पर अनुपचारित बीजों की तुलना में खरपतवारों के शुष्क भार में काफी गिरावट अंकित की । इन्होंने पत्ती क्षेत्र सूचकांक (Leaf Area Index), पत्ती क्षेत्र अवधि (Leaf Area Duration), ध्वज पत्ती क्षेत्र, (Flag Leaf Area) एवं फसल वृद्धि दर (Crop Growth Rate) की गणना की तथा पाया कि फसल वृद्धि दर अधिक होने पर ही खरपतवार के शुष्क भार में कमी होती है । अतः यह ऋणात्मक सहः सम्बधं अन्य अध्ययनों में भी प्रयोग किया जा सकता है । भागर्व एवं रंड्डी (१९९३) ने धान एवं खरपतवारों की वृद्धि का आकलन किया तथा पाया कि खरपतवार वृद्धि दर में गिरावट होने पर धान की फसल -वृद्धि दर में अनुपातिक वृद्धि होती है । परिणाम स्वरूप अधिक उपज प्राप्त
 हुई (सारणी -10) । इन्होंने पाया कि ६०-९० दिन की अवधि में अनुमानित फसल वृद्धि दर का दोनों की उपज पर घनात्मक अनुपातिक प्रभाव होता है ।

 इनकी मात्रा मिट्टी एवं खरपतवारों की किस्म और सघनता पर निर्भर करेगी । छिड़काव करते समय छोटी बूदों का हवा द्वारा लक्ष्य से बाहर जाना शाकनाशी अपवाह (Herbicide drift) कहलाता है । वृद्धि नियामक (Growth Regulator) अपतृणनाशी जैसे २,४-डी से इस प्रकार की अपवाह से काफी हानि देखी गई है । अतः निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिएः

(1)  कम हवा की गति में छिड़काव करें, (2) फल्डजैड अथवा फलैट फैन नोजिल का प्रयोग करने से बूदों का आकार बड़ा होगा, जिससे हवा के साथ बहने की संभावना घटेगी,

सारणी -11: विभिन्न खरपतवार नियंत्रण तकनीकों का धान एवं खरपतवारों की वृद्धि दर पर प्रभाव (तिरूपति,आ.प्र.) ।

 

उपचार

धान फसल-वृद्धि दर
             (ग्रा./मी.2/दिन)                     

खरपतवार-वृद्धि दर
              (ग्रा./मी.2/दिन)                        

ब्यूटाक्लोर,1*

3.4                          2.3

3.0                              -0.01

पेंडीमेंथीलीन,1*

2.1                          1.9

4.8                              -0.20

2,4--डी.ई.ई,1*

3.6                           1.9

2.4                               0.03

24,--डी.ई.ई,7*

2.8                           2.4

2.9                               0.30

हाथ से निराई २० एंव 40*

4.0                          2.1

2.5                               0.03

अनियंत्रित

-0.3                      -0.03

5.4                               1.50

क्रांतिक सीमा (०.०५)

0.4                         0.2

0.6                                0.20

*= दिन बाद । स्रोतः भार्गव एवं रेड्डी (१९९३)

(3) नोजिल के संचालन योग्य ही दबाव रखें, ज्यादा दबाव से बूदें अधिक दूर तक जाती हैं, (4) नोजिल को लक्ष्य के निकट रखें (5) संवेदनशील फसल एवं धान के बीच लगभग १० मीटर क्षेत्र छोड़ दें तथा अन्य खरपतवार नियंत्रण विधि अपनाएं ।

एक ही शाकनाशी को विभिन्न ट्रेड व्यापारिक अथवा ब्राण्ड (Trade or Brand) नाम से जाना जाता है । ये नाम उत्पादक कंपनियों से संबधित होते हैं । शाकनाशी अपने वास्तविक रसायन (Chemical) नाम से भी जाने जाते हैं, जिससे उनके सक्रिय अवयव (Active Ingredient) का ज्ञान होता है । साथ ही इनको
सामान्य (Common) नाम  भी दिया जाता है । अतःविभिन्न कम्पनियाँ एक ही सामान्य नाम के शाकनाशी का उत्पादन अलग-अलग व्यापारिक नाम से करते हैं । जैसेः

व्यापारिक नाम मेचेटी, नर्वदाक्लोर ब्यूटानेक्स आदि ।
रसायन नाम N-(buthoxy methyl)-2- chloro-N-(2,6 diethyl themyl) acetamide.
सामान्य नाम ब्यूटाक्लोर

खरपतवार नियंत्रण पेकेज
धान की फसल को उसकी उत्पादन तकनीक के अनुसार यदि पहले ४५ से ६० दिन खरपतवार मुक्त रखा जा सके, तब सामान्य दशा में उपज में नगण्य सी हानि होती है । अतः निराई अथवा अपतृणनाशी अथवा दोनों के उपयोग से उक्त परिस्थिति निर्मित करने के लिए कुछ सुझाव निम्न हैं:

पौदशाला
क. पंकलित खेत से पूर्व अंकुरित बीज की बिजाई के ६ दिन बाद ब्यूटाक्लोर या थायोबेंकार्ब १.५ कि.ग्रा. ए.आई./है. अथवा पेंडिमेंथेलीन १.० कि.ग्रा. ए. आई/ है. का प्रयोग करें । खेत में पानी का स्तर समान हो अन्यथा कुछ पौद मर जायेगी और कुछ क्षेत्रों में खरपतवार बच जायेंगे ।
ख. बिजाई के १५ बाद खरपतवार के शेष पौधों की हाथ से निराई करें ।

रोपाई की दशाः
क. पौद रोपाई के २-३ दिन के अंदर ब्यूटाक्लोर या थायोबेंकार्ब १.५ कि.ग्रा.ए.आई./है. अथवा एनिलोफास -०.४ कि.ग्रा. ए.आई./है. अथवा पेंडिमेंथेलीन - 0.75 से1.0 कि.ग्रा. ए. आई./है.  अथवा आँक्साडाइजोन 0.5 से0.75 कि.ग्रा.ए.आई./है.अथवा प्रीटीलाक्लोर-0.75 से1.0 कि.ग्रा.ए.आई./है. का प्रयोग करें । तरल शाकनाशियों को सीखे रेत में मिलाकर लगभग 5 सें.मी. पानी में समान रूप से बखेर दें । नैपसेक स्प्रे पम्प से छिड़काव भी किया जा सकता है ।
ख. दानेदार ब्यूटाक्लोर-३० कि.ग्रा. अथवा दानेदार थायोबेंकार्ब १५ कि.ग्रा. प्रति हैक्टर का रोपाई के २-३ दिन बाद लगभग ५ सें.मी. पानी में समान रूप से बखेर दें ।

ग. रोपाई के २०-३० दिन एवं ४०-५० दिन बाद हाथ से निराई करें । कम अवधि की किस्मों में २० एवं ४० दिन बाद निराई उचित होगी ।  

 सूखे खेत में सीधे बिजाई
क. बिजाई के बाद या ६ दिन तक थायोंबेंकार्ब-1.5 कि.ग्रा. ए.आई. /है. अथवा ब्यूटाक्लोर-1.25 कि.ग्रा.ए.आई./है.का 300 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें ।
ख. औक्सीफ्लोरफेन-०.१५ से ०.२० कि.ग्रा. ए. आई./है. का बिजाई के ३ दिन के अंदर छिड़काव करें । पानी की मात्रा ३०० लीटर प्रति हैक्टर पर्याप्त होगी ।

 ग. बिजाई के तुरन्त बाद अथवा ६ दिन के अंदर पेंडीमेंथलीन -१.५ कि.ग्रा.ए.आई /है. का छिड़काव करें । खेत में उपयुक्त मात्र में नमी होनी आवश्यक है ।

 घ. चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार आने पर बिजाई के २५ दिन बाद २,४ -डी १.० कि.ग्रा. ए. आई. /है. का पर्णीय छिड़काव करें ।

ड़ अपतृणनाशियों का प्रयोग न करने की स्थिति में बिजाई के २० से २५ एवं ४० से ५० दिन बाद हाथ से निराई करें ।

पंकलित खेत में सीधे बिजाई
ब्यूटाक्लोर-१.२५ कि.ग्रा. ए. आई./है. अथवा बैंथियोकार्ब -१.० कि.ग्रा. ए.आई./है. का प्रयोग बिजाई के ६ से ९ दिन के बीच करें । अपतृणनाशी समान रूप से वितरित होना चाहिए । चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण के लिए बिजाई के २०-२५ दिन बाद, २,४-डी-०.८ कि.ग्रा.ए.आई./है. का समान रूप से छिड़काव करें अथवा रेत में मिलाकर बखेर दें । एक सप्ताह तक लगभग ५ सें.मी. पानी रखें । बाद में २५ से ३० दिन बाद हाथ से एक बार और निराई करें ।

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