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धान आकारिकी


धान आकारिकी

1-   जड़े : 

  •         धान का बीज मूलांकुर से प्रारंम्भिक जड़ें निकलता है जो प्रकृत्या अस्थायी होती है जबकि क्रियाशील  जड़े कल्म की निचली गॉठो से उत्पन्न द्वितीयक अपस्थानिक जड़े होती हैं।
  •         धान रेषेदार मूल तंत्र रखता है जो मुख रूप से रोपे गए धान में मृदा के ऊपरी 20 से0मी0 तक सीमित रहता है। जबकि सीधी बोआई किए गए धान में अधिक गहरी जड़ें पाई जाती हैं।

2-   तने (डंठल) : 

  •         धान का तना या कल्म खोखला होता है और गॉठों एवं पोरियों का बना होता है।
  •         प्रत्येक गॉठ पर एक पत्ताी एवं कली होती है जो प्ररोह या दोजी में विकसित हो सकता है।
  •         प्राथमिक दोनियाँ एकांतर क्रम में मुख्य कल्म से निकलती हैं।
  •         वानस्पतिक वृध्दि (रोपाई के बाद 60 दिनाेंं तक) के दौरान दोजियाँ निकलती जाती हैं।


3. पत्ती :

  •         कल्म के प्रत्येक गॉठ पर पत्ताी निकलती है जिसके निम्न लिखित हिस्से होते हैं।

1-   पर्णच्छद : यह कल्म की गॉठ से उत्पन्न होता है। और इसे घेर कर रखता है।

2-   पर्णफलक : यह पत्ती का ऊपरी फैला हुआ हिस्सा होता है। और उसी गॉठ पर प्रारंभ होता है जहाँ यह पर्णच्छद के साथ जुड़ा होता है। जोड़ पर मोटा मूल स्तंभ संधि (कालर) होता है।

3-   पालि (ऑरिकल) : ये पर्ण फलक के आधार पर उपांग रखते है।

4-   जीमिका (लिग्यूल) : ये पालियों के ठीक ऊपर पतली कागजी संरचना होती हैं।

5-   ध्वजपूर्ण (फ्लैग लीफ) : यह पुश्पगुज के ठीक ऊपर सर्वोच्च पत्ताी होती है। सामान्यत: यह लंबाई में छोटी है और एक कोण पर सीधी बनी रहती है।

4. पुश्प गुच्छ :

  •         अंतस्थ प्ररोह पर उत्पन्न धान के पौधे का पुश्प क्रम और इसे पुश्पगुच्छ कहा जाता है।
  •         यह निष्चित प्रकार का होता है और पकने पर यह झुक जाता है।

5. स्पाइकिकर :  

  •         स्पाइकिकर :  पुश्प इकाई होती है और इसमें दो बंध्य बाह्य पुश्प कवच, एक बाह्य पुश्प कवच एक अंत: पुश्प कवच और पुश्प होता हैं।
  •         इसके अंग निम्नलिखित है।

1-   अंत: पुश्प कवच (लेमा) : यह षूक नामक (मध्य तंत्रिका का) तंतु रूप विस्तृत संयुक्त 5 तंत्रिका युक्त कठोर सहस्त्र होता है।

2-   बाह्य पुश्प कवच (पोलिया) :  यह अंत पुश्प कवच की अपेक्षा हलका - सा संकुचित 3-तंत्रिका युक्त सहस्त्र होता है।

3-   पुश्प : इसमें द्विकोषिका युक्त परागकोषों से युक्त 6 पुंकेसर और एक अंडाषय एक दो वर्तिकाग्रो से युक्त एक स्त्रीकेसर होता है। स्त्री केसर से एक बीजांड होता है।

4-   दाना :

                    I.    धान का दाना अंडाषय के साथ मजबूती के साथ चिपके हुए बाह्य पुश्प कवच एवं अंत: पुश्प कवच से युक्त पका हुआ अंडाषय होता है।

                  II.    अन्य अपेक्षाकृत छोटे घटकों से युक्त बाह्य पुश्प कवच एवं अंतपुश्प कवच तुश बनाते है और उपयोग के लिए छिलका उतराई में उतर जाते हैं।

                 III.    धान का फल के रिओस्सिस होता है। जिसमें एक बीज अंडाषय भित्ति (फल भित्ति के साथ मिली होती है।

                IV.    बीज में भूणपोश एवं भ्रूज होता है।

                 V.    भूण अधिक छोटा है। और केरिओसिस के अधर पार्ष्व पर पाया जाता है। इसमें प्रांकुर (भू्रण पत्तियों) और (मूलांकुर जड़) होते हैं जल में भिगोने सा बोने पर मूलांकुर जड़ के रूप में बढ़ता है और प्राकुर प्ररोह के रूप में बढ़ता हैं।

6. धान के आदर्ष प्रारूप (आइडियों टाइप)

  •         तना (कल्म) छोटा एवं कठोर होना चाहिए।
  •         दोजियां सीधी एवं सघन होनी चाहिए।
  •         इसे अधिक दोजियां उत्पन्न करने वाली प्रजाति होनी चाहिए।
  •         पत्ती मोटी, छोटी एवं सीधी होनी चाहिए।
  •         पुश्प गुच्छ अधिक लंबा और अधिक भारी होना चाहिए।



 

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