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दिसम्बर के मुख्य खेती-बाड़ी कार्य

 
फसलोत्पादन

  • गेहूँ की अवशेष बोआर्इ शीघ्र पूरी कर लें। ध्यान रहे कि बोआर्इ के समय मिÍी में भरपूर नमी हो।
  • इस समय बोआर्इ के लिए पी.वी.डब्लू. 373, राज 3765, यू.पी. 2425 तथा डी.बी.डब्लू-16 प्रजातियाँ उपयुक्त हैं।
  • देर से बोये गेहूँ की बढ़वार कम होती है और कल्ले भी कम निकलते हैं। इसलिए प्रति हेक्टेयर बीज दर बढ़ाकर 125 किग्रा कर लें लेकिन अगर यू.पी. 2425 प्रजाति ले रहे हैं तो प्रति हेक्टेयर 150 किग्रा बीज लगेगा ।
  • प्रमाणित अथवा अपनी प्रजाति का सत्य और शोधित बीज ही बोयें। यदि बीज शोधित न हो तो प्रति किलोग्राम बीज को 2 ग्राम कैप्टान अथवा 2.5 ग्राम थायरस से शोधित कर लें।
  • प्रति हेक्टेयर 120 किग्रा नाइट्रोजन, 60 किग्रा फास्फेट व 40 किग्रा पोटाश की जरूरत होगी। बोआर्इ के समय बलुआर दोमट भूमि में फास्फेट और पोटाश की समूची मात्रा के साथ 40 किग्रा नाइट्रोजन, जबकि भारी दोमट में 60 किग्रा नाइट्रोजन का प्रयोग करें।
  • बोआर्इ कतारों मे हल के पीछे कूड़ों में या फर्टीसीड डि्रल से करें।
  • अगर खेत में जस्ते की कमी हो, तो बोआर्इ के समय प्रति हेक्टेयर 25 किग्रा जिंक सल्फेट का प्रयोग करें।
  • गेहूँ की बोआर्इ के 20-25 दिन पर 5-6 सेंमी की पहली सिंचार्इ ताजमूल अवस्था पर और दूसरी सिंचार्इ 40-45 दिन पर कल्ले निकलते समय करें।
  • समतल खेत में सिंचार्इ के पहले, वरना सिंचार्इ के 4-6 दिन बाद नाइट्रोजन की टाप ड्रेसिगं कर दें। इसमें दरे न करें।
  • बलुर्इ दोमट भूमि में प्रति हेक्टेयर 40 किग्रा नाइट्रोजन (88 किग्रा यूरिया) व भारी दोमट भूमि में 60 किग्रा नाइट्रोजन (132 किग्रा यूरिया) की टाप ड्रेसिगं पहली सिंचार्इ के समय आवश्यक होगी।
  • बलुर्इ दोमट भूमि में नाइट्रोजन की शेष 40 किग्रा मात्रा  (88 किग्रा यूरिया) दूसरी सिचांर्इ के समय आवश्यक होगी ।
  • जहाँ गेहूँसा या गेहूँ का मामा कम है, लेकिन चौड़ी  पत्ती  वाले खरपतवार जैसे बथुआ काफी है और गेहूँ के साथ सरसो या रार्इ नही ली गयी है, वहाँ खरपतवार के नियंत्रण के लिए 2,4 डी सोडियम साल्ट, 80 प्रतिशत डब्यू.पी.की 625 ग्राम मात्रा 500-600 लीटर पानी में धोलकर बोआर्इ के 25-30 दिन बाद छिडकाव करें।
  • गेहूँसा या गेहूँ के मामा की रोकथाम के लिए प्रति हेक्टेयर 75 प्रतिशत वाली आइसोप्रोटयूरान 1.0 किग्रा या सल्फोसल्फ्यूरान 75 डब्लू.जी. की 33 ग्राम मात्रा 500-600 ली. पानी में घोलकर पहली  सिचांर्इ के बाद, परन्तु 30 दिन के अवस्था से पूर्व छिड़काव करना चाहिए।
  • सल्फोसल्फ्यूरान का प्रयोग करने पर चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार व गेहूँसा, दोनों का नियंत्रण हो जाता है।
  • जौ में पहली सिंचार्इ ,बोआर्इ के 30-35 दिन बाद कल्ले बनते समय करनी चाहिए।
  • सिंचार्इ के बाद नाइट्रोजन की शेष आघी मात्रा यानि 30 किग्रा (66 किग्रा यूरिया) प्रति हेक्टेयर की दर से टाप ड्रेसिग करें।
  • खरपतवार नियंत्रण गेहूँ की भांति करें।
  • बोआर्इ के 45-60 दिन के बीच पहली सिंचार्इ कर दें।
  • फिर ओट आने पर गुड़ार्इ करना काफी फायदेमन्द होगा।
  • झुलसा रोग की रोकथाम के लिए प्रति हेक्टेयर 2.0 किग्रा जिंक मैगनीज कार्बामेंट को एक हजार लीटर पानी में घोलकर 10 दिन के अन्तर पर दो बार छिड़काव करें।
  • बोआर्इ के 35-40 दिन पर पहली सिंचार्इ करें।
  • खेत की गुड़ार्इ करना भी फायदेमन्द होगा।
  • मसूर की बोआर्इ अभी भी कर सकते है, लेकिन प्रति हेक्टेयर 55 से 75 किग्रा बीज लगेगा।
  • बोआर्इ के 45 दिन बाद पहली हल्की सिंचार्इ करें।
  • ध्यान रखें , खेत में पानी खड़ा न रहे।
  • बोआर्इ के 55-65 दिन पर फूल निकलने के पहले हो दूसरी सिंचार्इ कर दें।
  • मक्का की बोआर्इ के 20-25 दिन बाद पहली निरार्इ-गुड़ार्इ करके सिंचार्इ कर दें और पुन समुचित नमी बनाये रखने के लिए समय-समय पर सिंचार्इ करते रहें।
  • रबी मक्का में प्राय׃ 4-6  सिंचार्इ की आवश्यकता पड़ती हैं।
  • बोआर्इ के लगभग 30-35 दिन बाद पौधों के लगभग धुटने तक की ऊँचार्इ  के होने पर प्रति हेक्टेयर 87 किग्रा यूरिया की प्रथम टाप ड्रेसिंग व इतनी ही मात्रा की दूसरी टाप ड्रेसिंग जीरा निकलने के पूर्व करनी चाहिए। ध्यान रहे यूरिया की टाप ड्रेसिंग करते समय खेत में पर्याप्त नमी होना आवश्यक हैं।
  • आवश्यकतानुसार सिंचार्इ करते रहें। इससे गन्ना सूखने नही पायेगा और वजनी भी बनेगा।
  • बोआर्इ के 45 दिन बाद पहली कटार्इ करें ।  फिर हर 20-25 दिन पर कटार्इ करते रहें।
  • हर कटार्इ के बाद सिंचार्इ करना जरूरी हैं।
  • हर तीन सप्ताह यानि 20-25 दिन पर सिंचार्इ करते रहें।
  • बोआर्इ के 20-25 दिन पर पहली सिंचार्इ के बाद 20 किग्रा नाइट्रोजन (44 किग्रा यूरिया) प्रति हेक्टेयर  की टाप ड्रेसिंग कर दें।
  • कटार्इ के बाद फिर से 20 किग्रा नाइट्रोजन (44 किग्रा यूरिया) प्रति हेक्ट्रेयर की दर से दूसरी टाप ड्रेसिंग करें और फिर उसके बाद सिंचार्इ कर दें।
  • सबिजयों में आवश्यकतानुसार सिंचार्इ एवं निरार्इ -गुडार्इ करें।
  • पौधे को पाले से बचाव के लिए छप्पर या धुए ँ का प्रबन्ध करें।
  • देर से बोये आलू में सिंचार्इ कर दें और बोआर्इ के 25 दिन बाद 87-108 किग्रा यूरिया की टाप ड्रेसिग करके मिÎी चढ़ा दें।
  • आलू में आवश्यकतानुसार 10-15 दिन के अन्तर पर सिंचार्इ करते रहें तथा झुलसा एवं माहू के नियंत्रण हेतु मैंकोजेब 2 ग्राम तथा फास्फेमिडान 0.6 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में मिलाकर 10-12 दिन के अन्तराल पर 2-3 छिड़काव करें।
  • सब्जी मटर  में बोआर्इ के 25-30 दिन बाद सम्पूर्ण आवश्यक नाइट्रोजन की आधी मात्रा अर्थात 30 किग्रा नाइट्रोजन (66 किग्रा यूरिया) टाप ड्रेसि्रग के रूप में देनी चाहिए।
  • सब्जी मटर में फूल आने के पूर्व एक हल्की सिचांर्इ कर दें । आवश्यकतानुसार दूसरी सिचांर्इ फलियां बनते समय करनी चाहिए ।
  • पिछेती फूलगोभी में 40 किग्रा नाइट्रोजन (87 किग्रा यूरिया) गांठगोभी में 34 किग्रा नाइट्रोजन (74 किग्रा यूरिया) की प्रथम टाप ड्रेसिंग रोपार्इ के 20-25 दिन बाद तथा इतनी ही मात्रा की दूसरी टाप ड्रेसिंग रोपार्इ के 45-50 दिन बाद करनी चाहिए।
  • टमाटर की उन्नत किस्मों में 40 किग्रा नाइट्रोजन (87 किग्रा यूरिया) व संकर असीमित बढवार वाली किस्मों के लिए 55-60 किग्रा नाइट्रोजन (120-130 किग्रा यूरिया) की प्रथम टाप ड्रेसिंग रापार्इ के 20-25 दिन बाद तथा इतनी ही मात्रा की दूसरी टाप ड्रेसिंग रोपार्इ के 45-50 दिन बाद करनी चाहिए।
  • टमाटर की ग्रीष्म ऋतु की फसल के लिए पौधशाला में बीज की बोआर्इ कर दें।
  • एक हेक्टेयर खेत की रोपार्इ के लिए टमाटर की उन्नत किस्मों की 350-400 ग्राम और संकर किस्मों की 200-250 ग्राम बीज की आवश्यकता पड़ती हैं।
  • बसन्त-ग्रीष्म ऋतु की टमाटर की फसल के लिए तैयार पौध की रोपार्इ करें।
  • सीमित बढ़वार वाली किस्मों की रोपार्इ 60×60 सेंमी तथा असीमित बढ़वार वाली किस्मों की रोपार्इ 75-90×60 सेंमी पर करें।
  • लहसुन की फसल में आवश्यकतानुसार निरार्इ-गुड़ार्इ तथा सिंचार्इ करें एवं 74 किग्रा यूरिया की प्रथम टाप ड्रेसिंग बोआर्इ के 40 दिन बाद व इतनी ही मात्रा की दूसरी टाप ड्रेसिंग बोआर्इ के 60 दिन बाद कर दें ।
  • फ्रेन्चबीन में पहली सिंचार्इ फूल आने के ठीक पहले तथा दूसरी सिंचार्इ फली बनते समय करनी चाहिए।
  • फ्रेन्चबीन में बोआर्इ के लगभग 30 दिन बाद 60 किग्रा नाइट्रोजन (130 किग्रा यूरिया) की टाप ड्रेसिंग करें ।
  • प्याज में खेत की तैयारी के समय रोपार्इ  से तीन-चार हफ्ते पहले प्रति हेक्टेयर 250-300 कुन्टल गोबर की सड़ी खाद या 70-80 कुन्टल नादेप कम्पोस्ट मिला दें। फिर रोपार्इ के पहले 33-34 किग्रा नाइट्रोजन,50 किग्रा फास्फेट एवं 60 किग्रा पोटाश का प्रयोग करें।
  • प्याज की रोपार्इ के लिए 7-8 सप्ताह पुरानी पौध का प्रयोग करें।
  • प्याज की रोपार्इ 15×10 सेंटीमीटर की दूरी पर करें।
  • प्याज में खरपतवार नियंत्रण के लिए रोपार्इ के दो-तीन दिन बाद पेन्डीमेथेलीन की 3.3 लीटर मात्रा 1000 लीटर पानी में धोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।
  • पालक व मेथी में पतितयों की प्रत्येक कटार्इ के बाद प्रति हेक्टेयर 20 किग्रा नाइट्रोजन (44 किग्रा यूरिया) की टाप ड्रेसिंग एवं सिचार्इ करें।
  • धनिया के पौधे 3-4 सेंटीमीटर के हो जाने पर प्रति हेक्टेयर 15 किग्रा नाइट्रोजन (33 किग्रा यूरिया) की टाप ड्रेसिंग कर दें । 15 किग्रा नाइट्रोजन (33 किग्रा यूरिया) की दूसरी टाप ड्रेसिंग पहली टाप ड्रेसिंग के 20-25 दिन बाद करें।
  • टमाटर एवं मिर्च में झुलसा रोग से बचाव के लिए मैंकोजेब 0.2 प्रतिशत (2 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करें।

 

फलों की खेती

  • आम तथा लीची में Þ मिलीबग ßकी रोकथाम के लिए प्रति वृक्ष 250 ग्राम मिथाइल पैराथियान  का बुरकाव पेड़ के एक मीटर के धेरे में कर दें। फिर पेड़ के तनेपर जमीन से 30-40 सेन्टीमीटर की ऊचार्इ पर 400 गेज वाली एल्काथीन की 30 सेन्टीमीटर चौड़ी पटटी सुतली आदि से कसकर बांध दें और उसके दोनों सिरों पर गीली मिट्टी  या ग्रीस से लेप कर दें। पेड़ पर मिली बग का प्रकोप नही होगा।
  • बेर, आँवला, नींबू, अमरूद, पपीता और केला आदि की आवश्यकतानुसार सिंचार्इ करते रहें।
  • आंवला के फलों की तुड़ार्इ एवं विपणन की व्यवस्था करें।
  • बेर के फलों को गिरने से रोकने के लिए सुपरफिक्स हामोंन 1.0 मिलीलीटर प्रति 4.5 लीटर पानी में धोलकर छिड़काव करें।
  • पुराने बागों में अन्तरासस्य के रूप में हल्दी व अदरक की फसल में आवश्यकतानुसार सिंचार्इ करें।
  • छोटे फल, पौधों को छप्पर लगाकर या धुआँ देकर पाले से बचायें।

पुष्प व सगन्ध पौधे

  • गुलाब में बडिंग और सिंचार्इ एवं निरार्इ-गुड़ार्इ करें।
  • ग्लैडियोलस में आवश्यकतानुसार सिंचार्इ एवं निरार्इ-गुड़ार्इ करें। मुरझार्इ टहनियों को निकालते रहें और बीज न बनने दें।
  • रजनीगंधा की अनितम बहार की कटार्इ-छँटार्इ, पैकिंग एवं विपणन करें।
  • मेंथा के लिए भूमि की तैयारी के समय अनितम जुतार्इ पर प्रति हेक्टेयर 100 कुन्टल गोबर की खाद, 40-50 किग्रा नाइट्रोजन, 50-60 किग्रा फास्फेट एवं 40-45 किग्रा पोटाश भूमि में मिला दें।

पशुपालनदुग्ध विकास

  • पशुओं को ठंड से बचाये रखें।
  • हरे चारे के साथ दाना भी पर्याप्त मात्रा में दें।
  • खुरपका, मुँहपका रोग से बचाव के लिए टीका जरूर लगवायें।
  • पशुओं में जिगर के कीडों (लीवर फ्लूंक) से रोकथाम के लिए कृमिनाशक पिलायें।
  • पशुओं व उनके बच्चों को पटेरे की दवा पिलायें।

मुर्गीपालन

  • अंण्डा देने वाली मुर्गियों को लेयर फीड दें और सीप का चूरा भी दें। बरसीम का हरा चारा भी थोड़ी मात्रा में दे सकते हैं।
  • पेट में कीड़े की दवा पिलपने से पहले तथा बाद में बी काम्प्लेक्स सिरप अवश्य दें।
  • यह देखे्र कि मुर्गियों को दिन में 15-16 धंण्टे प्रकाश मिलता रहें।
  • दिन में 3-4 बार अंण्डे एकत्र करें।
  • चूजों को ठंड से बचाने हेतु पर्याप्त गर्मी की व्यवस्था करायें।

 

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