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गेहूँ में उर्वरक उपयोग क्षमता को कैसे बढाएं

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गेहूँ में उर्वरक उपयोग क्षमता को कैसे बढाएं

राजीव कुमार

गो0ब0पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पन्तनगर,


 

भारतवर्ष में गेहूँ की खेती लगभग 2.40 करोड हैक्टर भमि में की जाती है। बौनी किस्मों के प्रचलन से गेहूँ की खेती में विस्तार हुआ है। इन सब के बावजूद औसत उपज में वध्दि नाममात्र ही हो सकी है। आशातीत उपज में वृध्दि न होने के कारणों में उर्वरक प्रयोग में अनियमितता एक मुख्य कारण हैं। अधिक उपज देने वाली किस्मों की उर्वरक उपयोग क्षमता अपेक्षाकृत अधिक होती है। इस कारण अधिक उपज देने वाली किस्मों को उगाने के लिए देशी किस्मों की अपेक्षा अधिक व्यय उर्वरक पर करना पडता है। अत: उर्वरक उपयोग क्षमता में वृध्दि के लिए समुचित प्रबंध की अति आवश्यकता है। उर्वरक उपयोग क्षमता में वृध्दि के लिए यह आवश्यक है कि उर्वरक प्रबंध के साथ ही साथ अन्य कृषि कार्य भी समुचित मात्रा में किए जाए।

 

उर्वरक की आवश्यकता

     पौधों की उचित वृध्दि एवं बढवार के लिए जो भी पोषक तत्व आवश्यक है उनमें नत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाश की आवश्यकता अधिक मात्रा में होती है। बौने गेहूँ की अच्छी फसल जो 60 क्ंविटल प्रति हैक्टर की दर से उपज देगी। वह मृदा से 175 कि0ग्रा0 नत्रजन, 62 कि0ग्रा0 फास्फोरस तथा 145 कि0ग्रा0 पोटाश तत्वों को इतनी मात्रा में फसल को उपलब्ध करा सकें। अत: फसल की आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए उर्वरक प्रयोग की आवश्यकता पडती है। पोषक तत्वों की उपलब्धता भूमि की किस्म के अनुसार भिन्न-भिन्न होती है। इस कारण उर्वरक की कितनी मात्रा प्रयोग में लार्इं जाय, इसके लिए मृदा का परीक्षण करना अत्यन्त आवश्यक है।

नाइट्रोजन

     भूमि की किस्म, फसल एवं जलवायु को ध्यान में रखकर नाइट्रोजन उर्वरक का चयन करना चाहिए। सामान्यत: यूरिया नत्रजन का एक अच्छा उर्वरक स्त्रोत है। क्षारीय भूमि में अमोनियम सल्फेट का प्रयोग यूरिया से अच्छा पाया गया है। अधिक अम्लता वाली भूमि में जहां अमोनियम उत्पन्न करने वाले नाइट्रोजन उर्वरक (यूरिया, अमोनियम सल्फेट एवं अमोनियम क्लोराइड) सतह पर बिखेर कर प्रयोग में लाये जाते है, वहां 10 से 30 प्रतिशत नत्रजन गैस बनकर उड जाती है। ऐसी जगहों के लिए कैल्सियम अमोनियम नाइट्रेट का प्रयोग उत्तम पाया गया है। अम्लीय भूमि के लिए नाइटे्रट नाइट्रोजन वाले उर्वरक स्त्रोत अपेक्षकृत अच्छे पाए गए है।

     फसलाके नाइट्रोजन देने का समय एवं िवधि भूमि की किस्म एवं जलवायु के अनुसार भिन्न-भिन्न होती है। मटियार एवं दोमट भूमि में नाइट्रोजन उपयोग क्षमता बढाने के लिए कुल नाइठ्रोजन की आधी मात्रा बोआई के समय 5 से0मी0 बीज से नीचे एक ही कूंड में अथवा बगल में कूंड बनाकर देनी चाहिएं शेष आधी मात्रा खडी फसल में पहली सिंचाई से पहले बिखेर देना चाहिएं बलुवार एवं बलुवार दोमट भूमि मे कुल नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा बोआई के समय बीज से 5 से0मी0 नीचे देनी चाहिए।  एक तिहाई मात्रा पहली सिंचाई से पहले एवं एक तिहाई मात्रा दूसरी सिंचाई से पहले खडी ुसल में छिडक कर देना चाहिए। क्षारीय भूमि में, कुल नाइट्रोजन की आधी मात्रा बोआई के समय एवं शेष आधी मात्रा दो बराबर भागों में पहली एवं दूसरी सिंचाई पर देनी चाहिए। शोध से ऐसा पाया गया है कि क्षारीय भूमि में 10 कि0ग्रा0 नाइट्रजन प्रति हैक्टर का फसल पर घोल के रूप में छिडकाव लगभग 60 कि0ग्रा0 नत्रजन प्रति हैक्टर भूमि में मिलाकर देने के बराबर प्रभावकारी होता है। जब किसान के पास लगभग 40 कि0ग्रा0 नाइट्रोजन एवं एक या दो सिंचाई की ही सुविधा उपलब्ध है तो उसे भारी भूमि में पूरी मात्रा बोआई के समय बीज से 5 से0मी0 नीचे कूंड में दे देनी चाहिए और हल्की भूमि में आधी मात्रा बोआई के समय बीज से 5 से0मी0 नीचे कूंड में एवं शेष मात्रा पहली सिंचाई के पहले खडी फसल में बिखेर देना चाहिए। असिंचित गेहूँ की फसल में कुल नाइट्रोजन की दो तिहाई मात्रा बोवाई के समय कूंड में देनी चाहिए तथा एक तिहाई मात्रा खडी फसल में घोल के रूप में छिडकाव किया जाना चाहिए। साधारणत: शुष्क जलवायु होने की सम्भावना वर्षा पर निर्भर रहने वाले गेहूँ के क्षेत्र में ज्यादा होती है। अत: वहां पर खडी फसल में नाइट्रोजन उर्वरक के प्रयोग की संस्तुति नही की जाती है। अगर जलवायु शुष्क नही है, वर्षा होती है तो खडी फसल में नत्रजन उर्वरक का प्रयोग किया जा सकता है। ऐसी दशा में घोल के रूप में छिडकाव नही किया जाना चाहिए। यदि घोल के रूप में छिडकाव सम्भव नही है तो नाइट्रोजन की सम्पूर्ण मात्रा बोआई पर दे देनी चाहिए। घोल के रूप में छिडकाव के लिए 2-2.5 प्रतिशत यूरिया के घोल का उपयोग किया जा सकता है। पहला छिडकाव बोआई के 40-50 दिन बाद करना चाहिए और बाद में छिडकाव 10-15 दिन के अन्तर पर किया जाना चाहिए। छिडकाव उसी समय करना चाहिए, जब आसमान साफ हो एवं हवा की गति कम हो। छिडकाव के लिए ऐसे यूरिया का ही प्रयोग करना चाहिए जिसमें वाईयूरेट की मात्रा एक प्रतिशत से कम हो।

     सामान्यतया सिंचित भूमि में गेहूँ की अच्छी उपज के लिए 100-150 कि0ग्रा0 प्रति हैक्टर नाइट्रोजन के प्रयोग की संस्तुति की जाती है। परन्तु अगर बोआई में देरी हो जाती है तो मात्रा 80-100 कि0ग्रा0 प्रति हैक्टर ही देनी चाहिए। जहां पर सिंचाई की सुविधा में अनियमितता हैं वहां पर भी 80-100 कि0ग्रा0 प्रति हैक्टर नाइट्रोजन की ही संस्तुति की जाती है। असिंचित भूमि में 60 कि0ग्रा0 नाइट्रोजन प्रति हैक्टर की संस्तुति की जाती है

फास्फोरस

डाई अमोनियम फास्फेट एवं सिगिल सुपर फास्फेट, फास्फोरस के लिए एक अच्छे उर्वरक स्त्रोत है। अम्लीय भूमि के लिए राक फास्फेट फास्फोरस का एक उत्तम स्त्रोत है। फास्फोरस का मृदा में विचरण बहुत मंद गति से होता है। अत: फास्फोरस उर्वरक का प्रयोग बोवाई के समय बीज से 5 से0मी0 नीचे एक ही कूंड अथवा बगल में कूंड बनाकर करना चाहिए। मृदा परीक्षण के बाद की फास्फोरस के प्रयोग की संस्तुति की जाती है। लेकिन मृदा परीक्षण न हो सकने की अवस्था में 50-60 कि0ग्रा0 प्रति हैक्टर फास्फोरस सिंचित भूमि में समय से बोई गई फसल को दिया जा सकता है। देर से बोई गई सिंचित भूमि में तथा अनियमित सिंचाई सुविधा वाले क्षेत्र में 40 कि0ग्रा0 फास्फोरस प्रति हैक्टर दिया जाना चाहिए। असिंचित भूमि वाले क्षेत्र में 20 कि0ग्रा0 फास्फोरस प्रति हैक्टर की संस्तुति की जाती है।

पोटाश

पोटाश के लिए म्यूरेट आफ पोटाश एक उत्तम उर्वरक है। पोटाश का भी विचरण भूमि में मंद गति से होता है। अत: पोटाश की कुल मात्रा का भूमि में बोआई के समय कूंड में देने की संस्तुति की जाती हैं 5 से0मी0 बीज से नीचे एक ही कूंड में अथवा बगल में कूंड बनाकर दिया जा सकता है। पोटाश का उपयोग मृदा परीक्षण की कमी नही पाई जाती है। साधरणतया भूमि में पोटाश की कमी नही पाई जाती है। लेकिन एक ही जगह पर एक ही तरह की फसल बार-बार उगाने से कुछ समय बाद पोटाश की कमी हो जाती है। ऐसी परिस्थिति में 40 कि0ग्रा0 प्रति हैक्टर पोटाश प्रयोग किया जा सकता है।

 

अन्य कृषि क्रियाए

उपयोग में लाये गए उर्वरक से उचित एवं अधिकतम उपज प्राप्त करने के लिए किसान को गेहूँ की खेती के लिए अन्य उन्नतशील विधियों का प्रयोग जैसे उत्तम खेत की तैयारी, उचित जाति का चयन, उचित बोआई का समय, उचित पौधों की संख्या, खरपतवार नियंत्रण, क्षेत्र एवं कीट नियंत्रण तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों का उपयोग अगर आवश्यक है, करना चाहिए। इसके अलावा समय से तथा उचित मात्रा में सिंचाई उर्वरक क्षमता को बढावा देता है। आवश्यकता से अधिक सिंचाई से पोषक तत्वों के रिसने एवं बहकर नष्ट हो जाने की संभावना होती है। अत: उर्वरक उपयोग क्षमता की बढोत्तरी के लिए यह आवश्यक है कि साथ ही साथ गेहूँ की खेती की उन्नतशील विधियों का प्रयोग किया जाय तभी अधिकतम उपज प्राप्त की जा सकती है।


इस लेख का संकलन प्रियंका शुक्ला द्वारा किया गया है।

 

 

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