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Hindi

रोगों और हानिकारक कीटों का एकीकृत प्रबन्ध : धान

रोगों और हानिकारक कीटों/ नाशक जीवों का एकीकृत प्रबन्ध

1. सामान्य सावधानियां

  • विषिष्ट क्षेत्रों के लिए प्रतिरोधी और सु-अनुकूलित प्रजातियों का चुनाव कीजिए।
  • स्वच्छ एवं रोगमुक्त बीजों का चुनाव कीजिए।

भूरा किट्ट या रतुआ (पर्ण किट्ट):गेहूँ

भूरा किट्ट या रतुआ (पर्ण किट्ट)

रोगकारी जीव: पक्सीनिया रिकॉन्डिटा फा. स्पि. ट्रिटिसाइ

मुख्य लक्षण: पत्तियों पर नारंगी से लेकर भूरे रंग के गोल बिखरे हुए स्फोट उत्पन्न होते हैं।

पीला किट्ट या हरदा (धारीदार किट्ट): गेहूँ

रोग: किट्ट

पीला किट्ट या हरदा (धारीदार किट्ट)

रोगकारी जीव: पक्सीनिया स्ट्रिइफार्मिस फा. स्पि. ट्रिटिसाइ

तना विगलन : धान

तना विगलन :

रोगकारी जीव: हेल्मिन्थोस्पोरियम सिग्माइडियम, वैरा इरेग्युलट (लेप्टोस्फेरिया साल्विनिक या मैग्नापोर्थे साल्विकी)

  • उच्च नाइट्रोजन स्तर तना विगलन बढ़ाते है परन्तु पोटेशियम अत्यधिक नाइट्रोजन के हानिकारक प्रभावों को घटाता है।
  • फॉस्फोरस भी रोग को उत्तेजित करता है परन्तु कम प्रभाव के साथ।

वानस्पतिक विवरण: मूल तंत्र

वानस्पतिक विवरण

मूल तंत्र :

मृदा :गेहूँ

मृदा :

      गेहूँ की खेती के लिए दुमट मृदा सर्वश्रेश्ठ होती है। गेहूँ की खेती के लिए मटियार एवं बलुई दुमट मृदा का भी उपयोग किया जा सकता है बषर्ते कि जल निकास की समुचित प्रणाली हो और ये मृदाएं अम्लीय या सोडीय मृदा संवर्ग की न हों। इसके अतिरिक्त गेहूँ का खेत खरपतवारों से मुक्त होना चाहिए।

भूरा पर्ण चित्ती : धान

भूरा पर्ण चित्ती :

रोगकारी जीव : हेल्मिन्थोस्पोरियम ओराइजी (कॉक्लियोबोलस मियाबीनस)

  • सिलिका, पौटेशियम, मैंगनीज या मैग्नीशियम या हाइड्रोजन सल्फाइड उपस्थिति में कमी रखने वाली मृदाएं इस रोग के लिए अनुकूल होती हैं।

मिथ्या कंड :

मिथ्या कंड

रोगकारी जीव : आस्टिलेजिनाइडीज विरेन्स

लक्षण

  • कवक पुष्पगुच्छ के अलग-अलग दानों के पीले या हरा-सा मखमली बीजाणु कंदुकों में परिवर्तित करता है।
  • ये बीजाणु कंदुक झिल्ली से ढके होते है जो आगे वृध्दि के साथ फट जाती है।

पर्णच्छद अंगमारी : धान

पर्णच्छद अंगमारी

रोगकारी जीव : राइजोक्टोनिया सोलानी (थैनेटेफोरस कुकुमेरिस)

  • उच्च आर्द्रता एवं गर्म तापमान इस रोग के लिए अनुकूल होते है।
  • निकट रोपाई एंव भारी उर्वरीकरण की रोग के आपतन को बढ़ाने की प्रवृति होती है। 
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