यह एक शीघ्रता से बढने वाली रोग निरोधक तथा अधिक फूटने वाली चारे की फसल है। शुष्क एवं अर्द्ध शुष्क क्षेत्रों मे इसकी बुवाई की जाती कल्ले है। यह अकेले अथवा दलहनी फसलों जैसे लोबिया या ग्वार के साथ मिलाकर बोई जाती है।
बलुई दोमट भूमि इसकी खेती के लिए अच्द्दी है। यह हल्की भूमि से भी भली प्रकार पैदा हो जाती है।
चारे के लिए संकर बाजरा की द्वितीय पीढी के बीज का प्रयोग करना चाहिये। जाइन्ट बाजरा, राजबो ,बाजरा ,राज बाजरा-२
२ या ३ जुताइयां देशी हल से करनी चाहिये।
बुवाई का समय: पहली वर्षा होने पर जुलाई माह में बुवाई करनी चाहिये।बीज दर: शुद्घ फसल के लिए १२-१५ किग्रा. बीज पर्याप्त होता है। मिलवां फसल में बाजरा तथा लोबिया/ग्वार (२:१) अनुपात में २ लाइन बाजरा तथा एक लाइन लोबिया/ग्वार बोनी चाहिये जिसके लिए ६-७ किग्रा. बाजरा तथा १२-१५ किग्रा. लोबिया बीज की आवश्यकता पड़ती है।बुवाई की विधि: छिटकवा, परन्तु मिलवां फसल में लाइनों में बुवाई करनी चाहिये।
१२० किग्रा. नत्रजन ४० किग्रा. फास्फेट प्रति हेक्टयर की दर से प्रयोग करना चाहिये। नत्रजन का आधी मात्रा बुवाई के समय तथा शेष आधा भाग दो बार में बराबर बराबर पहला २५-३० दिन तथा दूसरा भाग प्रथम कटाई के बाद करना नमी की दशा मे डालना चाहियें।
प्रायः वर्षाकाल में बोई गयी फसलों को सिचाई की आवश्यकता नही पड़ती है।
बाजरे की दो से तीन कटाइयां की जा सकती है। पहली कटाई बुवाई के ४५-५० दिन बाद तथा फूल निकलने से पूर्व समय करना चाहिये।
हरे चारा की औसत उपज ४००-५०० कुन्तल प्रति हेक्टेयर हो जाती है।
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Hemant Sharma
A User from Hanumangarh, Rajasthan,India
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